दुधारू मवेशी योजना क्या है ?

ग्रामीण क्षेत्र के गरीब रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों के लिए दुधारू मवेशी योजना के तहत लाभ देने का काम किया जाता है। इस योजना के अंतर्गत दुग्ध उत्पादन करने वालों को 50% अनुदान एवं 50% ऋण पर दो दुधारू मवेशी दिए जाते हैं। दुधारू मवेशी गाय अथवा भैंस हो सकते है। प्रत्येक मवेशी 6 माह के अंतराल पर दिया जाता है।
योजना लागत में पशु की खरीद के लिए 70,000 दिए जाते हैं। इसके अलावा मवेशियों को रखने के लिए गौ शाला के निर्माण के लिए 15,000 रुपए दिए जाते हैं। इसके अलावा 3 वर्षों के लिए पशु के लिए बीमा प्रीमियम करवाए कराया जाता है। इसके लिए 8000 का लाभ दिया जाता है।

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पशुओं में फॉस्फोरस की कमी के लक्षण एवं उपचार क्या है ?

पशुओं के शरीर में फॉस्फोरस के अपर्याप्त मात्रा में अथवा शरीर द्वारा उचित रूप से प्रयोग न होने पर पशुओं में फास्फोरस की कमी हो जाती है. लगभग 70 प्रतिशत फॉस्फोरस हड्डी और दांत की संरचना बनाने के लिए कैल्शियम के साथ उपयोग होता है. फॉस्फोरस शरीर की कोशिकाओं के केन्द्रक एवं सभी ऊत्तकों के कोशिका द्रव्य की संरचना का महत्वपूर्ण तत्व हैं. यह कंकालतंत्र, तंत्रिकातंत्र एवं मांसपेशियों के ऊत्तकों का एक सार्वभौमिकतत्व है. रूधिरसीरभ में फास्फोरस की कम मात्रा से उत्पन्न होने वाले विकार को हाइपोफॉस्फेटीमिया के रूप् में जाना जाता है. पशुओं में अत्याधिक मात्रा में फॉस्फोरस की कमी के कारण हड्डियों का रोग, रिकेट्स हो सकता है. फॉस्फोरस एवं कैल्शियम के अनुचित संतुलन से पशुओें में ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है

फॉस्फोरस की कमी के कारणः-

1. आहार में फॉस्फोरस की कमी

(1) मिट्टी मृदा में फॉस्फोरस की कमी होना

(2) सूखी घास एवं चारे में फॉस्फोरस का स्वाभविक रूप से कम होना.

(3) सूखे की दशा स्थिति में, चारे में फॉस्फोरस की कमी उत्पन्न हो जाना

2. शरीर द्वारा फॉस्फोरस का अपर्याप्त अवशोषण

(1) दुधारू पशुओं में दूध/दुग्ध के साथ फॉस्फोरस का अधिक मात्रा में स्त्राव होना.

(2) अग्रिम गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के विकास के लिए फॉर्स्फोरस की आवश्यकता में वृद्धि का होना

फॉस्फोरस की कमी के प्रकार

1. तीव्र :

तीव्र फॉस्फोरस की कमी सामान्यतः उच्च उत्पादकता वाली डेयरी गायों में स्तनपान की शुरूआती अवधि में अधिकतम पायी जाती है. स्तनपान की शुरूआत में फॉस्फोरस की अचानक से कमी होना शुरू हो जाती है. प्रसव्र की अवधि के आसपास पशु के आहार/चारा सेवन में कमी आना, फॉस्फोरस की कमी का एक बड़ा कारण माना जाता है.

2. जीर्ण

जीर्ण फास्फोरस की कमी पशुओं में आमतौर पर लंबे समय तक अपर्याप्त मात्रा में चारा लेने से उत्पन्न होती है एवं लम्बें समय तक पशुओं के आहार में फॉस्फोरस की कमी के कारण क्रोनिक फॉस्फोरस की कमी हो जाती है. इस प्रकार की फॉस्फोरस की कमी शुष्क क्षेत्र में चरने वाले पशुओं में पायी जाती है, क्योंकि इन स्थानों की मिट्टी में स्वभाविक रूप से फॉस्फोरस कम मात्रा में पाया जाता है.

3. अन्यः

फॉस्फोरस के बिना हाइपोफोस्फेटिमिया, इस प्रकार की फॉस्फोरस की कमीओरल एवं पेरेन्ट्र कार्बोहाइड्रेट सदेने के पश्चात कोशिकाओं द्वारा फॉस्फोरस के ग्लूकोज के साथ अधिक मात्रा में उपयोग की वजह के कारण फॉस्फोरस की कमी उत्पन्न हो जाती है.

प्रमुखलक्षण :

फॉस्फोरस की कमी से ग्रसित युवा पशुओं में, उत्सुकता, बेचैनी, मांसपेशियों में कमजोरी एवं हड्डियों में दर्द होना, लाल रूधिरकणिकाओं का अधिक संख्या में टूटने लगना, हाइपोफॉस्फेटीमिया में तंत्रिकातंत्र संबंधी लक्षण उत्पन्न होना, ह्दय गति एवं श्वासदरका बढ़ना, एटीपी की कमी के कारण श्वेतरक्तकणिकाओं एवं प्लेट्लेट्स के कार्य में शिथिलताआना, हाइपोफॉस्फेटीमिया के कारण दुधारू पशुओं में प्रसव के पश्चात पैरों पर खड़ा ना हो पाना, शिथिललेटेरहना.

जीर्ण फॉस्फोरस की कमी से ग्रसित युवा पशुओं में धीरे-धीरे वृद्धि होना, रिकेट्स उत्पन्न हो जाना एवं वयस्क पशुओं में शुरूआती अवधि में भूख लगना, सुस्त होना एवं वजन कम होना. बाद के चरणों में पशुओं में पाइका, ओस्टियोमलेशिया, असामान्य चाल, लंगड़ापन एवं अन्ततः अपने पैरों पर खड़े होने में असमर्थता उत्पन्न हो जाना प्रमुख लक्षण हैं.

पशुओं/गौंवशी पशुओं में लंबे समय तक फॉस्फोरस कैल्शियम, मैग्नीशियम या पोटेशियम की कमी के कारण होती है. इस स्थिति में पशु कैल्शियमलवण से उपचार के उपरान्त भी खड़ा नही होता.

निदान

1. इतिहास : अग्रिमगर्भवस्था / जल्दीस्तनपान

पशुओं को एकमात्र सूखा चारा खिलाना

2. लक्षणः कॉफी रंग के मूत्र का विर्सजन होना.

खून की कमी, पीलिया, यकृत एवं प्लीहा के आकार में वृद्धि होना.

3. जॉचे : (1) रूधिर : कम हीमोग्लोबिन, पीसीवी एवं टीईसी.

(2) बायोकैमिकलः सीरम में कम मात्रा में अकार्बानिक फॅास्फोरस

(3) मूत्रः मूत्र में हीमोग्लोबिन का पाया जाना

4. पशुओं के चारें एवं आहार की जांच.

5. मृदा में फॉस्फोरस की मात्रा की जांच.

शव परीक्षण

पशु का मृत शरीर दुबला-पतला, क्षीण अवस्था में होना. पसलियों, कंशेरूकाएं एवं श्रेणी टूटी हुई होना. तथा पशुओं के बाल खुरदरे होना.

पशु चिकित्सक द्वारा फॉस्फोरस की कमी से ग्रसित पशुओं की चिकित्सा निम्न प्रकार से की जा सकती है.

सोडियम एसिडफॉस्फेट अथवा वफरफॉस्फोरस का 50 मिग्रा0 इंजेक्शन पहलेदिन, दो-तीन दिन बाद 25 मिग्रा. का दूसरा इंजेक्शन, के साथ इलाज अत्याधिक प्रभावी होता है. खून की कमी की स्थिति में खून चढायें तथा मिनरल खनिज मिश्रण 25-50 ग्राम मात्रा में रोज पशु को खिलायें.

रोकथाम एवं नियंत्रण

पशुओं को आहार में संतुलित मात्रा में फॉस्फोरस उपलब्ध करायें.

मृदा में फॉस्फोरस की कमी को दूर करने के लिए फॉस्फोरस युक्त उर्वरक डालें.

गर्भावस्था के अन्तिम सप्ताह के दौरान आहार में अधिक मात्रा में फॉस्फोरस न दें, यह पशु के लिए प्राणघातक हो सकता है.

डॉ. रोहित बच्छराज – 9053596020

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पशु के लिए संतुलित दाना मिश्रण कैसे बनायें?

संतुलित दाना मिश्रण कैसे बनायें

पशुओं के दाना मिश्रण में काम आने वाले पदार्थों का नाम जान लेना ही काफी नही है। क्योंकि यह ज्ञान पशुओं का राशन परिकलन करने के लिए काफी नही है। एक पशुपालक को इस से प्राप्त होने वाले पाचक तत्वों जैसे कच्ची प्रोटीन, कुल पाचक तत्व और चयापचयी उर्जा का भी ज्ञान होना आवश्यक है। तभी भोज्य में पाये जाने वाले तत्वों के आधार पर संतुलित दाना मिश्रण बनाने में सहसयता मिल सकेगी। नीचे लिखे गये किसी भी एक तरीके से यह दाना मिश्रण बनाया जा सकता है, परन्तु यह इस पर भी निर्भर करता है कि कौन सी चीज सस्ती व आसानी से उपलब्ध है।

1.

मक्का/जौ/जई 40 किलो मात्रा
बिनौले की खल 16 किलो
मूंगफली की खल 15 किलो
गेहूं की चोकर 25 किलो
मिनरल मिक्सर 02 किलो
साधारण नमक 01 किलो
कुल 100 किलो

2.

जौ 30 किलो
सरसों की खल 25 किलो
बिनौले की खल 22 किलो
गेहूं की चोकर 20 किलो
मिनरल मिक्स 02 किलो
साधारण नमक 01 किलो
कुल 100 किलो

3.

मक्का या जौ 40 किलो मात्रा
मूंगफली की खल 20 किलो
दालों की चूरी 17 किलो
चावल की पालिश 20 किलो
मिनरल मिक्स 02 किलो
साधारण नमक 01 किलो
कुल 100 किलो

4.

गेहूं जौ या बाजरा 20 किलो मात्रा
बिनौले की खल 27 किलो
दाने या चने की चूरी 15 किलो
बिनौला 15 किलो
आटे की चोकर 20 किलो
मिनरल मिक्स 02 किलो
नमक 01 किलो
कुल 100 किलो

ऊपर दिया गया कोई भी संतुलित आहार भूसे के साथ सानी करके भी खिलाया जा सकता है। इसके साथ कम से कम 4-5 किलो हरा चारा देना आवश्यक है।

 

दाना मिश्रण के गुण  लाभ

  • यह स्वादिष्ट व पौष्टिक है।
  • ज्यादा पाचक है।
  • अकेले खल, बिनौला या चने से यह सस्ता पड़ता हैं।
  • पशुओं का स्वास्थ्य ठीक रखता है।
  • बीमारी से बचने की क्षमता प्रदान करता हैं।
  • दूध व घी में भी बढौतरी करता है।
  • भैंस ब्यांत नहीं मारती।
  • भैंस अधिक समय तक दूध देते हैं।
  • कटडे या कटड़ियों को जल्द यौवन प्रदान करता है।

संतुलित दाना मिश्रण कितना खिलायें

1. शरीर की देखभाल के लिए:

  •  गाय के लिए 1.5 किलो प्रतिदिन व भैंस के लिए 2 किलो प्रतिदिन
  1. दुधारूपशुओं के लिए:
  • गाय प्रत्येक 2.5 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना
  • भैंस प्रत्येक 2 लीटर दूध के पीछे 1 किलो दाना
  1. गाभिनगाय या भैंस के लिए:
  • 6 महीने से ऊपर की गाभिन गाय या भैंस को 1 से 1.5 किलो दाना प्रतिदिन फालतू देना चाहिए।
  1. बछड़ेया बछड़ियों के लिए:
  • 1 किलो से 2.5 किलो तक दाना प्रतिदिन उनकी उम्र या वजन के अनुसार देना चाहिए।
  1. बैलोंके लिए:
  • खेतों में काम करने वाले भैंसों के लिए 2 से 2.5 किलो प्रतिदिन
  • बिना काम करने वाले बैलों के लिए 1 किलो प्रतिदिन।

नोट : जब हरा चारा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो तो उपरलिखित कुल देय दाना 1/2 से 1 किलो तक घटाया जा सकता है।

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लॉक-डाउन का पशु-पालन पर क्या असर हो रहा है ?

भारत में 7 करोड़ से ज़्यादा घरों में पशुपालन किया जाता है, ये वही घर जिनसे दूध भारत के नगरों और महानगरों में जाता है। इन घरों में खेती बाड़ी के साथ पशु पालन आय का मुख्या हिस्सा है। लॉक-डाउन शुरू होने के बाद से सोशल मीडिया पर ऐसी काफी फोटोज आईं जिसमे दूध को नालों में बहाया जा रहा है, किसान अपनी गाय को महंगे फल खिला रहा है।

“जहाँ पिछले कुछ दिनों से एक बोरी पशु-आहार के रेट 900 रूपए से बढ़कर 1300 रूपए पहुँच गया है, वहां दूध का रेट गिरकर 20 – 25 रूपए लीटर रह गया है। ये सबसे डेयरी फार्मर को बहुत दिक्कत आ रही है।” महाराष्ट्र के गणेश जी ने बताया।शहरों में सप्लाई नहीं जा पाने के कारण दूध से बानी चीज़ें जैसे – आइस क्रीम, पनीर, मिठाइयों की डिमांड भी कम हो गई है।

बड़ी ट्रांसपोर्टर कंपनियों से बात करने में पता चला है की लगभग पुरे भारत के यही हालत हैं। हाल ही में, सरकार ने सभी बड़े विक्रेताओं और ट्रांसपोर्टरों की मीटिंग में इन्हे लॉक-डाउन में स्पेशल परमिशन दी है, ताकि ये मंडी से दुकानों तक सामान ले जा सकें। उम्मीद की जा रही है की कुछ दिनों में हालात सुधरेंगे और किसान भाई फिर से पशु-पालन का चिंतामुक्त आनंद उठा पाएंगे।

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दूध में फैट और SNF कैसे बढाएं ?

दूध में फैट और SNF मात्रा होती है वो आहार के साथ साथ पशु के जीन और नस्ल पर निर्भर करता है। अगर आप वही आहार दो अलग नस्ल के पशु को देंगे फिर भी उनकी जो फैट की मात्रा है उसमे बहुत ही ज्यादा फरक रहता है। अगर आपको दूध फैट के आधार में बेचना है तोह पशु खरीदते समय उसका फैट की मात्रा जाँच करवा लें।

ऐसे में पशुपालक अपने दुधारू पशु को हरे चारे और सूखे चारे का संतुलित आहार देकर दूध में वसा की मात्रा को बढ़ा सकते हैं।

किसान भाई नीचे दिए फार्मूले से फ़ायदा उठा सकते हैं। यह रोशन पशुओं को देना होता है जो दूध देते हैं।
A) एक सो ग्राम टाटा का नमक
B) दो सो ग्राम सरसों का तेल
C) एक सो ग्राम गुड
D) सो ग्राम कैल्शियम
इन चारों चीजों को मिलाकर दुधारू पशुओं को दें इस से अंदर की कमज़ोरी कम होगी और पशु जितना जियादा हो सके दूध देगा

 

 

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