एरोपोनिक्स तकनीक और कुछ संसाधनों से घर में ही हो सकती है केसर की खेती।

कृषि का सही ज्ञान और खेती का सही चुनाव किसानों की आय को भी बढ़ा सकता है और बाजार की मांग को भी पूरा कर सकता है। ऐसे में आप केसर को ही ले लीजिए। केसर की कीमत चांदी से ज्यादा है। लेकिन बावजूद इसके बहुत कम लोग हैं जो केसर की खेती करने की सोचते हैं। ऐसा इसलिए भी क्योंकि उन्हें लगता है कि केसर की खेती के लिए कश्मीर में जाना होगा। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। आप केसर की खेती अब घर पर भी कर सकते हैं। इसे एक बंद कमरे में किया जा सकता है।

आज हम एरोपोनिक्स तकनीक के जरिए होने वाली केसर की खेती के बारे में सूचित करेंगे। इसके अलावा हम आपको बता दें कि कुछ लोग अमेरिकी केसर की खेती करते हैं और उसे साधारण केसर ही समझते हैं। लेकिन ये केसर बिल्कुल अलग है। आइए विस्तार से जानते हैं कि केसर की खेती आप किस तरह घर के किसी बंद कमरे में कर सकते हैं। अगर आप इसकी खेती से जुड़ी किसी भी प्रकार की जानकारी हासिल करना चाहते हैं, तो हमारे लेख और वीडियो पर अंत तक बने रहें।

कैसे होती है बंद कमरे में केसर की खेती 

कृषि से जुड़े हुए लोग इस बात से भली भांति परिचित हैं, कि केसर की खेती कश्मीर जैसे ठंडे तापमान में की जाती है। ऐसे में जब केसर की खेती किसी कमरे में करनी होती है, तो इसमें कई संसाधनों की आवश्यकता होती है। ये संसाधन न केवल तापमान को नियंत्रित करते हैं। बल्कि फसल को पोषक तत्व पहुंचाने में भी सहायता करते हैं। आपको बता दें कि एरोपोनिक्स तकनीक के जरिए ही केसर की खेती करते हैं। 

केसर की खेती के फायदे 

केसर एक दुर्लभ और बेहद महंगी सामग्री है। इसका उपयोग कई खाद्य सामग्री में किया जाता है। इसके साथ ही भारत के अलावा दुनिया के अलग – अलग कोने में केसर की मांग काफी अधिक है। आइए विस्तार से समझते हैं कि केसर के फायदे क्या हैं और इसे क्यों लगाना चाहिए। 

  1. केसर की मांग दुनिया भर में है। इसलिए इसकी खेती कर आसानी से आय अर्जित कर सकते हैं। 
  2. केसर की कीमत 3 लाख रुपए किलो से लेकर 7 लाख रुपए किलो तक होती है। 
  3. केसर का सेवन आम घरों में भी होता है और इसे एक – एक ग्राम करके भी बेचा जा सकता है। 
  4. केसर का उपयोग कई कॉस्मेटिक कंपनियां करती है। आप चाहें तो केसर की खेती कर इन्हें अपनी पूरी फसल बेच सकते हैं।
  5. इससे केसर की मांग को पूरा किया जा सकेगा।
  6. केसर की खेती कर रोजगार के अधिक अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

केसर की खेती में लगने वाले संसाधन 

केसर की खेती के लिए आपको कुछ खास तरीके के संसाधनों की जरूरत होती है। इन संसाधनों के बिना केसर की खेती किसी बंद कमरे में नहीं की जा सकती। 

  • चिलर मशीन 
  • ह्यूमिडिफायर
  • एसी 
  • लकड़ी की ट्रे
  • एलईडी लाइट 
  • मिस्ट
  • केसर के बीज

केसर की खेती में लागत

इन सभी चीजों पर आपको अपनी जगह के हिसाब से 5 से 7 लाख रुपए तक खर्च करने पड़ सकते हैं। लेकिन अगर सही तरीके से इस खेती को किया जाए तो इससे तीन ही महीने में 15 से 21 लाख रुपए तक कमाए जा सकते हैं। यानी महज तीन महीने के बाद ही निवेश की गई राशि से कई गुना रकम आप हासिल कर पाएंगे। 

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क्या है Electric Bull? इलेक्ट्रिक बुल के फायदे और इससे जुड़ी संपूर्ण जानकारी

हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। लेकिन आज भी देश में 90 प्रतिशत के आस पास छोटे किसान है। ये वो किसान हैं जिनके पास भूमि का बहुत छोटा सा हिस्सा है। इसी छोटे से हिस्से पर की गई खेती के जरिए किसान अपना गुजारा करते हैं। इन किसानों के पास इतना पैसा नहीं होता कि ये आधुनिक मशीन खरीद लें। ऐसे में इनके दिन का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ी चीजों में ही निकल जाता है।

लेकिन अब बाजार में ऐसी कई मशीनें आ गई है, जो न केवल किसानों के काम को आसान कर देंगी। बल्कि इसे वो खरीद भी पाएंगे. हम बात कर रहे हैं, एक ऐसी ही मशीन के बारे में जिसे इलेक्ट्रिक बुल कहा जाता है। ये इलेक्ट्रिक बुल किसानों के कई तरह के काम आसानी से कर सकता है। आइए आज इस लेख और वीडियो के जरिए इस इलेक्ट्रिक बुल से जुड़ी जानकारी हासिल करते हैं। 

क्या है ये Electric Bull 

ये एक बिजली से चलने वाली आधुनिक मशीन है, जिसका उपयोग खेती से जुड़े कामों में किया जाता है। इस मशीन का निर्माण महाराष्ट्र की कृषि गति कंपनी ने किया है। इस मशीन के जरिए जुताई, गुड़ाई, कीटनाशक छिड़काव जैसे काम आसानी से किए जा सकते हैं। इसे आप एक मिनी ट्रैक्टर भी मान सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ये ट्रैक्टर से होने वाले सभी काम आसानी से कर सकता है और इसकी कीमत भी काफी कम है। 

क्यों रखा गया मशीन का नाम इलेक्ट्रिक बुल 

महाराष्ट्र के तुकाराम ने और उनकी पत्नी ने मिलकर ही ये मशीन बनाई है। उनका कहना है कि आज भी भारत के अंदर मध्यमवर्गीय किसान या छोटे किसान खेती में फसल की जुताई के लिए ट्रैक्टर नहीं खरीद पाते। इसलिए उन्होंने एक ऐसी मशीन बनाने का फैसला किया जो बैल और ट्रैक्टर के काम कर पाए और इसकी कीमत भी कम हो। इसलिए भी इसका नाम इलेक्ट्रिक बुल रखा गया है, क्योंकि ये बुल या बैल के सारे काम कर सकता है। इसके साथ ही ये बिजली से चलता है इसलिए इसके आगे इलेक्ट्रिक बुल कहा गया है। 

इलेक्ट्रिक बुल के फायदे 

इस बुल के कई फायदे हैं जो आर्थिक रूप से भी देखने को मिल सकते हैं। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस इलेक्ट्रिक बुल के फायदे क्या हैं। 

  • ये मशीन आकार में बेहद छोटी है और बिजली से चलती है। 
  • इस मशीन के जरिए बैल और ट्रैक्टर से होने वाले ज्यादातर काम किए जा सकते हैं। 
  • मशीन के जरिए खेत को जोतने का काम कुछ ही देर में किया जा सकता है। 
  • ये इलेक्ट्रिक बुल चार्ज होने में दो घंटे लेती है और 6 घंटे तक काम कर सकती है। 
  • इसे गुड़ाई का काम भी आसानी से किया जा सकता है। 
  • इलेक्ट्रिक बुल के अंदर कुछ ऐसे फीचर्स भी दिए गए हैं, जिसके जरिए कीटनाशक छिड़काव भी किया जा सकता है। 
  • एक तरफ जहां ट्रैक्टर को खरीदने के लिए 7 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करने होते हैं। वहीं इसकी लागत करीब 2,75000 तक है। 
  • इलेक्ट्रिक बुल का आकार छोटा है इसलिए इसे आसानी से कहीं भी रखा जा सकता है। 
  • इस इलेक्ट्रिक बुल को किराए पर देकर किसान भाई रोजाना 500 से 600 रुपए तक कमा सकते हैं। 

इलेक्ट्रिक बुल कहां से खरीदें 

अगर किसान भाई इस इलेक्ट्रिक बुल को खरीदना चाहते हैं तो वह कृषि गति की साइट पर जाकर इसे आसानी से खरीद सकते हैं। हमने आपको पहले भी बताया है कि इस बुल की कीमत 2 लाख 75 हजार रुपए तक है। 

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Biofloc से मछली पालन करना हुआ आसान। घर से ही कर सकते हैं शुरु।

मत्स्य पालन करना भारत में हमेशा ही एक अच्छा विकल्प माना जाता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि भारत में 35 मिलियन मीट्रिक टन मछलियों की मांग है। लेकिन आज भी इस मांग को पूरा करने के लिए भारत को दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए आज हम एक ऐसी तकनीक लेकर आपके सामने आए हैं। जिसके जरिए आप अपने घर से ही मछली पालन करना शुरू कर सकते हैं। 

हम बात कर रहे हैं बायोफ्लॉक तकनीक के बारे में। इस तकनीक के जरिए घर में या बाहर कहीं टैंक बनाकर भी मछली पालन किया जा सकता है। इसके साथ ही टनों मछलियों का उत्पादन किया जा सकता है। अगर आप बायोफ्लॉक तकनीक से जुड़ी किसी भी प्रकार की जानकारी हासिल करना चाहते हैं तो आप हमारे इस लेख पर बने रहें, या फिर हमारी वीडियो भी देख सकते हैं। 

क्या है बायोफ्लॉक तकनीक 

बायोफ्लॉक तकनीक का इजाद इंडोनेशिया में किया गया था। इस तकनीक में तारपोलिन के टैंक में मछलियों को पाला जाता है। इसमें एयरेशन सिस्टम की मदद से मछलियों को ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है।  इसके अलावा इस तकनीक में सबसे खास चीज ये है कि इसमें मछलियों के मल को साफ करके प्रोटीन में तब्दील किया जाता है। बाद में जब ये मल प्रोटीन में तब्दील हो जाता है तो मछलियां इसी मल को खा जाती हैं। इससे मछलियों का आकार तेजी से बढ़ता है और उनका वजन भी बढ़ता है। 

बायोफ्लॉक तकनीक से मछली पालन के फायदे 

बायोफ्लॉक तकनीक के कई ऐसे फायदे हैं, जिसकी वजह से इस तकनीक को तेजी से अपनाया जा रहा है। अब हम आपको नीचे कुछ ऐसे ही फायदों के बारे में विस्तार से बताएंगे। 

  • इस तकनीक के जरिए मछली पालन में खर्च कम होता है। 
  • बायोफ्लॉक तकनीक के जरिए मछली पालन करने में पानी की खपत कम होती है। 
  • इस तरह मछली पालन करने में मछलियों के चोरी होने का खतरा कम रहता है। 
  • एक तरफ जहां एक एकड़ के तालाब में 5 टन मछलियों का ही उत्पादन हो सकता है। वहीं तारपोलिन या सीमेंट एक स्क्वैर फुट के टैंक से ही 2.5 टन मछलियों का उत्पादन किया जा सकता है। 

बायोफ्लॉक तकनीक के लिए संसाधन

  1. इसमें मछली पालन के लिए सीमेंट या तारपोलिन का टैंक बनाया जाता है। 
  2. मछलियों को ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए एयरेशन सिस्टम की जरूरत होती है। 
  3. बायोफ्लॉक में बिजली का होना जरूरी है। इसमें आप घर की बिजली या सोलर पैनल भी लगा सकते हैं। 
  4. मछली पालन के लिए मत्स्य बीज जरूरी होता है। 
  5. शेड का निर्माण ऐसा होना चाहिए जिससे मछलियों को धूप मिले। 
  6. जिस जगह मछली पालन हो वहां के तापमान को 28 से 30 तक रखना चाहिए। इस तापमान को बनाए रखने के लिए मछली पालन सीमेंट में करें। 

बायोफ्लॉक में आने वाली लागत 

बायोफ्लॉक तकनीक में आने वाला खर्च निर्भर करता है कि आप कितने बड़े स्तर पर  मछली पालन करना चाहते हैं। लेकिन एक छोटे स्तर पर भी मछली पालन करने के लिए आपको 50 से 60 हजार रुपए तक खर्च करने होंगे। 

इस तकनीक मछली पालन की आय 

इस तकनीक के जरिए मछली पालन करने से आपकी आय काफी हद तक बढ़ सकती है। इस तकनीक के जरिए आप अगर अच्छा निवेश करते हैं तो आप सालाना लाखों रुपए तक कमा सकते हैं। आ इस कारोबार की शुरुआत अपने घर से ही कर सकते हैं। 

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जानिए खेती की नई तकनीक हाइड्रोपोनिक्स से जुड़ी संपूर्ण जानकारी।

आज देश में ज्यादातर लोग अपना गुजारा केवल खेती के जरिए ही करते हैं। जिसके लिए न केवल मिट्टी बल्कि बहुत सारा पानी भी चाहिए। वहीं दूसरी तरफ दुनिया में जल संकट मंडरा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 2050 तक देश की 55 प्रतिशत आबादी के पास पीने का पानी तक नहीं होगा। ऐसे में खेती के लिए भी हमें ऐसी तकनीक की जरूरत है जो कम से कम पानी का इस्तेमाल करें और तेजी से फल फूल सके।

 आज हम आपको अपने इस लेख और  वीडियो में बताने वाले हैं ऐसी ही तकनीक के बारे में, जिसे हाइड्रोपोनिक्स के नाम से भी जाना जाता है। इस तकनीक में मिट्टी का योगदान जरा भी नहीं होता और पानी की बचत भी 90 प्रतिशत तक हो सकती है। आइए विस्तार से जानते हैं इस तकनीक के बारे में और देखते हैं कि ये हाइड्रोपोनिक्स तकनीक कैसे काम करती है और इसके क्या फायदे हैं।  

क्या है हाइड्रोपोनिक्स 

हाइड्रोपोनिक्स का इजाद आज से बहुत साल पहले यानी 1937 में इजराइल में हुआ था। इस तकनीक का लक्ष्य भूमि पर होने वाली निर्भरता को कम करना था। इस तकनीक में भूमि का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ये पूरी तरह से पानी पर निर्भर रहने वाले खेती है। हालांकि पानी की खपत भी इस तकनीक के जरिए 90 प्रतिशत तक कम होती है। 

हाइड्रोपोनिक्स के फायदे 

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक के कई फायदे हैं जो लंबे समय तक देखे जा सकते हैं। इसके कुछ निम्नलिखित फायदे हम आपको नीचे बता रहे हैं। 

  1. इस तकनीक के जरिए खेती करने के लिए उपजाऊ मिट्टी की जरूरत नहीं होती।  
  2. इस तकनीक से कम जगह पर अधिक चीजों की फसल को बोया जा सकता है। 
  3. हाइड्रोपोनिक्स तकनीक की  वजह से भूमि प्रदूषण नहीं होता। 
  4. इस तकनीक से होने वाली फसल बहुत तेजी से फलती फूलती है। 
  5. ये तकनीक उन आम लोगों के लिए भी कारगर है जो घर पर ही खेती करने के तरीके खोजते रहते हैं। 

हाइड्रोपोनिक्स खेती में लगने वाले संसाधन

हाइड्रोपोनिक्स खेती में आपको कुछ खास संसाधनों की जरूरत होती है। इसमें से सबसे पहला संसाधन है पीवीसी पाइप का। आपको पीवीसी पाइप के सेटअप की जरूरत है। इसमें पाइप का सेटअप A आकार की तरह होना चाहिए। ताकि फसल को बराबर धूप मिलती रहे। 

इसके अलावा इसमें आपको निरंतर पानी और कुछ पोषक तत्वों की जरूरत होगी। जिन्हें पानी के साथ मिलाया जा सके और फसल को दिया जा सके। 

अगर आप हाइड्रोपोनिक्स के जरिए खेती घर के अंदर ही कर रहे हैं तो आपको इसके लिए एलईडी लाइट की जरूरत भी होगी। ताकि धूप से मिलने वाली चीजें फसल को एलईडी लाइट से मिल जाएं। 

हाइड्रोपोनिक्स से खेती करने के लिए आपको इसकी ट्रेनिंग भी लेनी होगी। बिना ट्रेनिंग के इस तकनीक के इस्तेमाल से आर्थिक नुकसान होने का खतरा है। लिहाजा इस तकनीक से जुड़ी सभी जानकारियां हासिल करने के लिए आपको ट्रेनिंग की जरूरत होगी। 

हाइड्रोपोनिक्स में लागत 

अगर आप इस तकनीक के जरिए खेती करना चाहते हैं तो बता दें कि इसमें आपको कम से कम 10 से 15 हजार रुपए खर्च करने होंगे। इसके बाद ही आप खेती का सेटअप कर पाएंगे। आज हम आपको इसके अलावा अगर आप सेटअप बड़ा लगवाते हैं तो इसके लिए आपको अधिक पैसा खर्च करना होगा। 

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जानिए कैसे Aeroponics तकनीक से हवा में की जाती है आलू की खेती।

अगर भारत को एक विकसित देश बनाना हैं तो इसके लिए जरूरी है कि किसानों की आय बढ़े। इसके अलावा कृषि क्षेत्र में हो रहे आधुनिक बदलावों को छोटे – छोटे स्तर पर भी अपनाया जा सके। इसलिए आज हम एक ऐसी तकनीक लेकर आए हैं। जिसके जरिए आप आसानी से हवा में आलू की खेती कर सकते हैं। ये बात सुनने में अजीब लग सकती है। लेकिन है पूरी तरह सच। 

आज के समय में बहुत सी जगह पर एरोपोनिक्स तकनीक के जरिए आलू की खेती की जा रही है। आज हम इसी तकनीक को विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही एरोपोनिक्स तकनीक के जरिए खेती करने के फायदे और लागत क्या है, ये भी जानेंगे। अगर आप भी हवा में आलू की खेती करना चाहते हैं तो हमारे इस लेख और वीडियो पर अंत तक बने रहें।

क्या है एरोपोनिक्स तकनीक 

ये आज के युग की एक ऐसी तकनीक है जिसमें बिना मिट्टी के खेती की जाती है। इसमें पौधों की जड़ों को एक अंधेरी जगह में हवा में रखा जाता है। वहीं फसल के ऊपरी भाग को सूरज कके सामने रखा जाता है। इसमें फसल की जड़ों को सीधा पोषक तत्व दिए जाते हैं और इससे फसल तेजी से बढ़ने लगती है और आलू जैसी सब्जी की फसल भी 40 से 70 दिन में तैयार हो जाती है। 

एरोपोनिक्स तकनीक से खेती के फायदे 

इस तकनीक के जरिए खेती करने के कई फायदे हैं। जिनमें से सबसे बड़ा फायदा ये है कि इस तरीके से खेती करने से पानी की बचत हो सकेगी और ऐसी जगह भी आलू उगाया जा सकेगा। जहां पानी की कमी बहुत ज्यादा है। 

एरोपोनिक्स तकनीक के जरिए खेती करने का दूसरा बड़ा फायदा ये है कि आलू की गुणवत्ता बहुत बेहतर होगी। इसके अलावा आलू का आकर भी एक जैसा होगा। जिसके चलते इन्हें चिप्स कंपनियों के जरिए बेचा जा सकेगा। 

एरोपोनिक्स तकनीक से खेती करने के लिए आपको उपजाऊ मिट्टी की जरूरत भी नहीं होती। ऐसा इसलिए क्योंकि ये खेती हवा में होती है और इस तकनीक में मिट्टी का योगदान नहीं होता। 

कैसे काम करती है एरोपोनिक्स तकनीक 

  • इसमें फसल का जड़ वाला हिस्सा अंधेरे में और हवा में रहता है। इसके ठीक नीचे कुछ नोजल लगे होते हैं। 
  • ये नोजल समय – समय पर पोषक तत्वों का छिड़काव फसल पर करते हैं। 
  • इन नोजल में मौजूद पोषक तत्व एक टैंक से पानी के जरिए फुहार के रूप में आते हैं। 
  • टैंक में पोषक तत्वों का घोल डाला जाता है और हर दो सप्ताह में बदला जाता है। 
  • फसल पर हर 5 मिनट बाद 30 सेकंड तक पोषक तत्वों की फुहार पड़ती रहती है। 
  • फसल की ताजगी बनाए रखने के लिए इसके पत्तों पर पानी की फुहार ऊपर से छोड़ी जाती है। 
  • ये पूरी यूनिट इलेक्ट्रिसिटी से चलती है और पूरी तरह ऑटोमेटिक होती है। 
  • इसके अलावा फसल को कीड़ो से बचाने के लिए समय – समय पर कीटनाशक डाला जाता है। 

एरोपोनिक्स तकनीक में लागत 

खेती करने की ये तकनीक थोड़ी महंगी जरूर है। लेकिन ये एक बार का निवेश किसान भाइयों को 10 साल तक आराम दे सकता है। इस यूनिट की लागत 6 से 10 लाख रुपए हो सकती है। 

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