खुरपका मुंहपका रोग: पहचान, उपचार और भलाई

खुरपका मुंहपका रोग दुधारू पशुओं में होने वाला एक बेहद ही आम रोग है। ये एक तरह का वायरल संक्रमण है, तो कि पशुओं में काफी तेजी से फैलता है। गाय को खुरपका मुंहपका रोग होने पर उसके मुंह और खुरों में घाव बनने लगते हैं, जो कि गंभीर होने पर पूंछ और थनों में भी हो सकते हैं।

ये रोग एफ्थोवायरस के कारण होता है, इस वायरस के कई प्रकार होते हैं, जिनकी वजह से ये संक्रमण पैदा होता है। आमतौर पर संक्रमण के चार दिन बाद इसके लक्षण पशु में दिखने लग जाते हैं। मुंह और खुरों में छाले पड़ना और घाव बनना इसके सबसे प्रमुख लक्षण हैं। इसके अलावा गाय की सेहत के मुताबिक भी कुछ और लक्षण पशु में हो सकते हैं, जैसे कि बुखार होना।

खुरपका मुंहपका रोग का कोई भी सटीक इलाज नहीं है। हालांकि, इसके लक्षणों के मुताबिक डॉक्टर इसकी दवा दे सकते हैं। अगर समय पर इसका इलाज नहीं किया जाए तो इससे गाय पूरी तरह से दूध देना बंद भी कर सकती है। यहां तक की कई बार पशु की जान तक चली जाती है।

 

क्या है खुरपका मुंहपका रोग

खुरपका मुंहपका एक वायरल संक्रमण है, जो कि पैर में दो खुर वाले जानवरों को होता है। ये काफी तेजी से फैलने वाला संक्रमण है, जो कि संक्रमित जानवर को गंभीर रूप से बीमार कर देता है। जैसा कि इस रोग का नाम है, इस से जानवर का मुंह और खुर दोनों काफी ज्यादा प्रभावित होते हैं। अंग्रेजी भाषा में इसे “फुट एंड माउथ डिजीज” के नाम से भी जाना जाता है। खुरपका मुंहपका रोग वाली गाय शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो जाती है और उसके दूध उत्पादन में भी काफी कमी आ जाती है।

 

खुरपका मुंहपका रोग के लक्षण

गाय के खुरों और मुंह पर घाव और छाले बनना इस रोग का सबसे साफ लक्षण होता है, ये छाले आमतौर पर खुरों के बीच में और मुंह के अंदर के हिस्से में बनते हैं। इसके अलावा कुछ गंभीर मामलों में गाय की पूंछ और थन आदि पर भी ये घाव बन सकते हैं। ये सभी लक्षण गाय को संक्रमण होने के चार दिनों के बाद ही नजर आते हैं। हालांकि, कुछ गायों में लक्षण नजर आने में ज्यादा वक्त भी लग सकता है।

इतना ही नहीं खुरपका मुंहपका रोग में मुंह और खुरों पर छालों के साथ कुछ और लक्षण भी दिखते हैं, जैसे कि –

  • गाय को 3 दिन या उससे ज्यादा वक्त तक बुखार रह सकता है।
  • गाय के मुंह में जरूरत से ज्यादा झाग बनने लगती है
  • उसे चारा और दाना खाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है
  • पशु लंगड़ाते हुए चलता है या फिर वो तल ही नहीं पाता है
  • गाय शारीरिक रूप से काफी ज्यादा कमजोर हो जाती है और उसकी हड्डियां तक नजर आने लगती है
  • गाय जुगाली करना बंद कर देती है
  • पशु दूध देना कम कर देती है, ज्यादा फैलने की स्थिति में दूध देना बिलकुल ही बंद कर देती है

 

कब दिखाएं डॉक्टर को

अगर आपकी गाय के मुंह और खुरों में घाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है, तो जल्द से जल्द पशु चिकित्सक को दिखा लेना चाहिए।

 

क्यों होता है खुरपका मुंहपका रोग

खुरपका मुंहपका रोग को एक वायरल संक्रमण कहा जाता है। ये रोग एफ्थोवायरस की वजह से होता है। एफ्थोवायरस के प्रमुख सात प्रकार होते हैं, जो खुरपका मुंहपका रोग का कारण बनते हैं। इन्हें ए (A), ओएचएसएस(O), सी(C), एसएटी1 (SAT1), एसएटी 2 (SAT2), एसएटी3 (SAT3) और एशिया1 (ASIA) के नाम से जाना जाता है। ये वायरस जंगली जानवरों के जरिये आया है।

 

कैसे फैलता है वायरस?

एफ्थोवायरस से होने वाला संक्रमण आमतौर पर दूसरे संक्रमित जानवरों के संपर्क में आने से होता है। ये वायरस संक्रमित जानवरों की लार, गोबर, दूध और बाकी शारीरिक द्रवों के जरिये ये फैलता है। अगर कोई स्वस्थ पशु इनमें से किसी के संपर्क में आता है, तो उसे ये रोग बहुत आसानी से हो सकता है।

कुछ परिस्थितियों में गाय को खुरपका मुंहपका रोग होने का खतरा बढ़ जाता है –

  • गाय को अगर आप संक्रमित पशुओं के साथ रखेंगे
  • एक ही खुरली से बांधना
  • एक ही बर्तन में पानी पिलाना
  • संक्रमित पशु का झूठा खिलाना

कई बार गाय में संक्रमण के लक्षण कम होने लगते हैं, लेकिन फिर भी वो अन्य जानवरों में संक्रमण फैला सकती है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि लक्षणों के जाने के बाद भी कुछ दिन तक गाय के शारीरिक द्रवों में वायरस थोड़ा बहुत सक्रिय रह सकता है।

 

कैसे करें खुरपका मुंहपका रोग से पशु का बचाव

खुरपका मुंहपका रोग एक प्रकार का वायरल संक्रमण है, जिसका परीक्षण सिर्फ डॉक्टर के जरिये ही किया जा सकता है। इस स्थिति को जांचने के लिए डॉक्टर गाय के मुंह और खुर के घावों को काफी पास से देखता है। वायरस के संक्रमण की पुष्टि के लिए घाव से द्रव का सैंपल लेकर कुछ टेस्ट भी डॉक्टर करवा सकता है।

 

खुरपका मुंहपका की जांच

खुरपका मुंहपका रोग होने के बाद घरेलू उपायों की मदद से उसकी रोकथाम नहीं की जा सकती है। हालांकि, इस रोग को बाकी जानवरों में फैलने से रोका जा सकता है। खुरपका मुंहपका रोग के लिए टीका भी तैयार किया जा सकता है, जिसे उचित समय पर लगवाने से गाय को खुरपका मुंहपका रोग होने से बचाया जा सकता है।

हालांकि एक ही टीके से एफ्थोवायरस के सभी प्रकारों को रोका नहीं जा सकता है, इन सबके लिए अलग टीकाकरण किया जाता है और इसके साथ ही ये टीका एक सीमित समय तक ही वायरस से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

 

खुरपका मुंहपका रोग का इलाज क्या है

खुरपका मुंहपका रोग के लिए कोई पक्का इलाज नहीं है। संक्रमित गाय को बाकी जानवरों से दूर रखना ही इसका सबसे पहला और जरूरी इलाज है। गाय के लक्षणों के अनुसार ही उसे दवाएं दी जाती हैं। पशु चिकित्सक इस रोग के इलाज के लिए आमतौर पर एंटी इंफ्लामेटरी, बुखार और दर्द निवारक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि, अगर रोग ज्यादा गंभीर नहीं होता है, तो कई बार वो बिना दवाओं के भी अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन रोग की गंभीरता की पुष्टि डॉक्टर के द्वारा की जाती है, वो ही ये तय करता है कि कब रोग को इलाज की जरूरत है और कब नहीं। क्योंकि कुछ मामलों में ये रोग इलाज नहीं करवाने पर भी धीरे-धीरे गंभीर होने लगता है। जो कि बाद में इलाज से भी नियंत्रित नहीं हो पाता है। जिस वजह से पशुओं की मृत्यु होने लगती है।

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गाय को दस्त होने के कारन, लक्षण और उसका इलाज

ये काफी आम बात है कि गाय को दस्त की शिकायत हो रही है। जब भी गाय को ये बीमारी होगी तो वो काफी पतला गोबर करेगी। ऐसे में बार-बार गाय को पतला गोबर आएगा, तो उसका शरीर काफी कमजोर हो सकता है। गाय को दस्त होने के पीछे का मुख्य कारण पशु की पाचन क्रिया खराब होना या फिर पेट में किसी तरह का संक्रमण होने की वजह से होता है। हालांकि ज्यादा गर्मी लगने की वजह से भी पशु को ये बीमारी हो सकती है।

पिचकारी की तरह पतला गोबर निकलना दस्त का मुख्य लक्षण होता है। इसके अलावा गाय के स्वास्थ्य के अनुसार भी कुछ अन्य लक्षण हो सकते हैं, जैसे कि बुखार, कमजोरी, घास ना खाना। इससे बचने के लिए ज्यादा कछ नहीं करना होता है बस साधारण सफाई अपना कर और उसके खाने के संबंधित सही जानकारी लेकर गाय को दस्त से बचाया जा सकता है।

अगर गाय को दस्त हो जाता है तो उसका इलाज घरेलू उपायों से भी किया जा सकता है। हालांकि गंभीर स्थिति में डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी होता है और डॉक्टर कारण और लक्षणों के मुताबिक अलग अलग दवाएं देते हैं। दवाओं के साथ-साथ शरीर में पानी और पोषक तत्वों को पूरा करने के लिए भी तरीके अपनाए जाते हैं।

गाय को दस्त होना वैसे तो एक आम स्थिति है, लेकिन कई बार ये गंभीर हो जाती है। जिस कारण इसकी सेहत पर गंभीर असर होता है। गाय को कई प्रकार के दस्त होते हैं, जिनमें के कुछ अन्य जानवरों में फैलने वाले भी होते हैं।

 

गाय को दस्त के लक्षण

गाय का गोबर काफी पतला आता है या फिर उसमें किसी तरह का द्रव मिला हुआ होता है। इसके अलावा इस रोग में गाय में कई अन्य लक्षण भी देखें जा सकते हैं, जो गाय के स्वास्थ्य और रोग के अंदरूनी कारणों पर निर्भर करते हैं। इसके अलावा गाय को दस्त होने की स्थिति में कई लक्षण देखें जाते हैं।

  • पिचकारी की तरह गोबर आना
  • गोबर में द्रव या फिर झाग आना
  • बदबूदार गोबर का आना
  • हर थोड़ी देर बाद गोबर आना
  • गाय के बैठे हुए में ही गोबर निकल जाना
  • गोबर में खून आना

गाय को कब्ज होने की स्थिति में उसका शरीर काफी ज्यादा प्रभावित होता है। जिस वजह से उसे कई समस्याएं हो सकती है। इन समस्याओं के आधार पर पशु को अन्य लक्षण भी आ सकते हैं।

  • शरीर में कमजोरी का आ जाना, जिस कारण पशु पूरा दिन बैठा रहता है
  • गाय को बुखार हो जाना
  • पशु की आंखों से पानी निकलना
  • जरूरत से ज्यादा ठंड लगना
  • शरीर में कंपन होना
  • पेट की हड्डियां दिखाई देना

 

डॉक्टर को कब दिखाएं

आमतौर पर दस्त का इलाज घर पर ही किया जाता है, लेकिन अगर एक दिन से ज्यादा होने पर और अगर घरेलू उपाय काम नहीं कर रहे हैं, तो डॉक्टर से बात करें।

 

किन कारणों से होता है गाय को दस्त रोग

गाय को दस्त लगने के कारण बहुत ही आम हो सकते हैं, जैसे कि ज्यादा हराई खाना या फिर गर्मी लग जाना। जबकि अगर डॉक्टर की माने तो उनके मुताबिक पशु को दस्त होने के 2 कारण होते हैं, जिनमें पाचन संबंधी रोग और अलग अलग तरह के संक्रमण शामिल होते हैं।

गाय को पाचन से जुड़ी समस्याओं के कारण भी दस्त होते हैं, और इनके कारण है – 

  • ज्यादा हराई खिलाना
  • ज्यादा मात्रा में फीड, चना, या फिर चारा खिलाना
  • गंदा पानी पिलाना
  • पुराना या सड़ा हुआ चारा खिलाना
  • गंदे पानी में उगी घास चराना
  • कीटनाशकों और रसायनों वाली घास खिलाना
  • ज्यादा संख्या में बिनोला या उसकी खल खा लेना

गाय को दस्त कई बार कुछ तरह की दवाओं की वजह से भी हो जाता है। इन दवाइयों में ज्यादातर गाय की त्वचा पर कीड़ों को मारने की दवाएं होती है, वहीं दूध बढ़ाने वाली दवाएं और बाकी गर्म दवाएं भी गाय को दस्त की शिकायत दे सकती है।

 

संक्रमण

अगर आपकी गाय को दस्त की बीमारी हो गई है, तो उसके पीछे पेट में होने वाले संक्रमण भी होते हैं। जिसमें आमतौर पर वायरल इंफेक्शन शामिल होता है। गाय को दस्त होने का कारण बनने वाले वायरल इंफेक्शन को बोवाइन वायरल डायरिया कहते हैं। ये रोग ज्यादातर संक्रमित पशु के संपर्क में आने की वजह से ही होता है। नीचे लिखें तरीकों से गाय इस रोग के संपर्क में आती है-

  • संक्रमित जानवर की लार, जुगाली के संपर्क में आने से
  • एक ही बर्तन में पानी पीने से
  • एक ही खुरली में घास खाने से
  • संक्रमित पशु के आस-पास रहने की वजह से

 

गाय को दस्त लगने से कैसे बचाएं

गाय को कई कारणों से दस्त हो सकता है, जिनमें से कुछ मामलों में बचाव किया जा सकता है, लेकिन कई बार रोकथाम मुश्किल हो जाती है। दस्त से बचाव के तरीके उनके कारणों पर निर्भर करते हैं। आप नीचे लिखें तरीकों से दस्त से बचाव कर सकते हैं – 

– गाय को ताजी और साफ घास चराएं

– गंदे पानी में उगी या फिर बासी घास खिलाने से बचें

– सर्दियों में ज्यादा हराई न दें अदर दें तो सूखा भूसा भी उसमें मिलाते रहें

– साफ और ताजा पानी पीने के लिए दें

– फीड, अनाज, दाना, खल सभी चीजों की मात्रा का खास ध्यान रखें, इस बारे में चाहें तो पशु चिकित्सक से बात करें

– गाय को गर्मी ना लगने दें और तेज धूप के दिनों में उसे बांधें नहीं और हवादार जगह पर रखें

– गाय को दिन में कई बार ताजा पानी पिलाएं

– उसकी लार और बाकी द्रवों को तुरंत ही नष्ट कर दें ताकि बाकी जानवर उसके संपर्क में ना आ सकें

 

गाय को दस्त होने का इलाज कैसे करें

गाय को दस्त की बीमारी होने पर सबसे पहले उसके कारणों और रोग की गंभीरता समझनी बेहद जरूरी है। अगर दस्त की समस्या ज्यादा गंभीर ना हो तो घरेलू उपाय भी कर सकते हैं। लेकिन अगर दस्त ठीक नहीं हो रहे हैं तो डॉक्टर से राय लेने के लिए जरा भी नहीं हिचकिचाएं। डॉक्टर इस दौरान गाय को ठंडी चीजें खिलाने की सलाह दे सकते हैं, जैसे सरसों की खल, सरसों का तेल, दही आदि। साथ ही इस वक्त में गाय को गर्म चीजें देने से परहेज करने के लिए भी डॉक्टर कह सकता है। अगर गाय को वायरल बोवाइन हो गया है तो चिकित्सक गाय के लक्षण और परेशानी को समझ कर दवा देगा। आमतौर पर डॉक्टर रिहाइड्रेशन फ्लूइड, अलग तरह के खनिज और पोषक तत्व देते हैं। जो कि शरीर में पानी और जरूरी पोषक तत्वों की कमी को पूरा करते हैं। साथ ही ये दस्त को भी नियंत्रण में रखते हैं।

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बीमारियों से बचाए रखने के लिए गाय का टीका कब लगाना चाहिए

भारत देश में गाय को महज एक पशु नहीं, बल्कि माता के तौर पर भी देखा जाता है। गाय का उपयोग न केवल दूध निकालने और खेती के लिए किया जाता है। बल्कि हिंदू धर्म के वाचक इस पशु की पूजा भी करते हैं। यही कारण भी है कि गाय की सेहत का ध्यान रखने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कई गाय का टीका का अभियान भी चलया जाता है। 

आपको बता दें कि जिस तरह से किसी शिशु का समय – समय पर टीकाकरण कराना जरूरी होता है। उसी तरह गाय का टीकाकरण भी बहुत जरूरी होता है। आज हम आपको अपने इस लेख में गाय के टीकाकरण से जुड़ी तमाम जानकारियां साझा करेंगे। इसके साथ ही आप पशुपालकों को यह भी समझाएंगे कि आखिर क्यों गाय का टीकाकरण आवश्यक है। अगर आप भी एक पशुपालक हैं और गाय के टीकाकरण से जुड़ी किसी प्रकार की जानकारी हासिल करना चाहते हैं तो हमारे इस लेख पर अंत तक बने रहें। 

 

गाय का टीकाकरण क्यों है महत्वपूर्ण

हम सभी जानते हैं कि पशुपालकों के लिए गाय केवल खेती बाड़ी का ही जरिया नहीं है। बल्कि गाय के द्वारा प्राप्त दूध, घी आदि बेचकर भी पशुपालक पैसा कमाते हैं। ऐसे में अगर गाय अस्वस्थ हो जाए तो इससे उनकी दूध देने की क्षमता पर असर पड़ता है। इसके अलावा कई बार गाय कुछ ऐसे रोगों से संक्रमित हो जाती है। 

जिसमें उनके थनों तक को काटना पड़ता है। यही नहीं कई बार कुछ रोगों के चलते गाय की मौत तक हो जाती है। गाय की मृत्यु होने पर या उनके बीमार होने पर गाय के जरिए कमाई जाने वाली आय कम हो जाती है। इसके अलावा पशुपालकों की खेती बाड़ी का काम भी सही तरह से नहीं हो पाता। ऐसे में गाय को खतरनाक रोगों से बचाने के लिए और उन्हें  स्वस्थ बनाए रखने के लिए उन्हें टीके लगवाना जरूरी हो जाता है। 

 

गाय को लगाए जाने वाले टीके 

गाय एक दुधारू पशु है जिसे समय – समय पर कई टीके देने की आवश्यकता होती है। अब हम ऐसे ही कुछ सामान्य टीकों के बारे में जानेंगे, जो गाय को समय समय पर दिलवाने चाहिए। 

 

गाय को दिया जाने वाला गलघोटू टीका 

गलघोटू रोग एक संक्रामक और खतरनाक रोग है। जिसके दौरान गाय के मुंह से लार गिरती है और सांस लेने में भी दिक्कत होती है। ऐसे में गाय को गलघोटू रोग से बचाने के लिए इन्हें साल में दो बार टीके लगवाए जाते हैं। इस टीके में 5 एमएल एलम दवा होती है, जो चमड़ी के ठीक नीचे इंजेक्ट की जाती है। यूं तो आमतौर पर गलघोटू का टीका जून और दिसंबर के दौरान घर – घर जाकर मुफ्त में  लगाया जाता है। लेकिन अगर कोई पशुपालक अपनी सुविधा के अनुसार गाय का  टीकाकरण कराना चाहते  हैं, तो ऐसा वह कर सकते हैं। लेकिन इसमें डॉक्टर की राय लेना बहुत जरूरी है। 

 

मुंह खुर (एफ.एम.डी) 

मुंह खुर एक बहुत संक्रामक और खतरनाक रोग है। इस रोग के दौरान पशु के मसूड़ों के पास छोटे – छोटे दाने हो जाते हैं। यह दाने कुछ समय में बड़े छाले और घाव का रूप ले लेते हैं। इसके अलावा कई बार पशु के मुंह में भयंकर दर्द रहने लगता है। जिसकी वजह से वह कुछ खा पी भी नहीं पाता। इस संक्रामक रोग से गाय को बचाए रखने के लिए मुंह खुर का टीका लगाया जाता है। यह टीका पशु को साल में दो बार मई एवं नवंबर में दिया जाता है। आपको बता दें कि पशुओं को मुंह खुर से बचाए रखने के लिए सरकार टीकाकरण का मुफ्त अभियान बड़े स्तर पर चलाती है। इस अभियान में गाय को टेट्रावेलेंट नामक दवा के टीके का 5 एमएल डोज दिया जाता है। यह गाय की चमड़ी के नीचे दिया जाता है।  

 

संक्रामक गर्भपात का टीकाकरण 

गाय और भैंस के गर्भापात की स्थिति ब्रूसेलोसिस नामक जीवाणु के चलते होती है। इस स्थिति में पशु के गर्भधारण करने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है और अधिकतर 6 से 8 वे महीने के दौरान गाय का गर्भपात भी हो जाता है। गाय को इस खतरनाक रोग से बचाए रखने के लिए उसके जन्म के 6 महीने से लेकर 8 महीने की आयु के बीच गाय को यह टीका दिया जाता है। गाय को दिए जाने वाले इस टीके का नाम कोटन -19 स्ट्रेन है। गाय को यह टीका चमड़ी के नीचे दिया जाता है। इसकी मात्रा केवल 5 एमएल ही होती है। 

  

लंगड़ा बुखार 

लंगड़ा बुखार जिसे लोग काला बुखार के नाम से भी जानते हैं। आपको बता दें कि यह रोग अमूमन गाय भैंस जैसे अधिक वजन वाले जीवों को ही होता है। ऐसे में पशु को लंगड़े बुखार की समस्या से बचाने के लिए समय पर एलम नामक दवा का टीका दिया जाता है। यह टीका पशु को केवल 5 एमएल ही होता है। इसके अलावा लंगड़े बुखार का ह टीका पशु को हर 6 महीने में एक बार दिया जाता है।  

 

गाय के लिए चलाए जाने वाले टीकाकरण अभियान 

हमने जैसा कि आपको बताया था कि देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी पशुपालन के जरिए ही अपना गुजारा करता है। ऐसे में इन पशुओं की देखरेख ठीक से हो और पशु लंबे समय तक स्वस्थ रहें। इसके लिए कई टीकाकरण अभियान चलाए जाते हैं। ऐसे ही कुछ टीकाकरण अभियान हैं जो सरकार द्वारा चलाए जा रहे हैं। इस टीकाकरण अभियान में गाय को गलघोटू, लंगड़ा बुखार, और मुंह खुर जैसे रोगों से बचाने के लिए मुफ्त टीकाकरण देश भरे में हो रहे हैं। 

 

गाय को लगाए जाने वाले सामान्य टीके 

रोग  टीका  डोज टीकाकरण का समय 
गलघोटू एलम  5 एम एल  हर 6 महीने में 
मुंह खुर टेट्रावेलेंट  5 एम एल 6 महीने या इससे कम आयु में
लंगड़ा बुखार  एलम 5 एम एल हर 6 महीने में
संक्रामक गर्भपात कोटन -19 स्ट्रेन 5 एम एल 6 से 8 माह की आयु में

 

गाय को होने वाले अन्य रोग और टीके 

ब्लैक क्वार्टर और इलाज 

यह रोग गाय को बारिश के दिनों में मिट्टी की वजह से होता है। इस रोग के दौरान पशु को तेज बुखार हो जाता है और सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। यह रोग होने पर इसकी शुरुआत में ही पशु को पेनिसिलिन का टीका दिया जाता है। 

 

एनाप्लाजमोसिस और इलाज 

यह रोग गाय को एनाप्लाजमा मार्जिनल जीवाणु के कारण होता है। इस रोग के दौरान पशु के शरीर से खून निकलने लगता है। जिसकी वजह से खून की कमी भी होने लगती है। इस रोग से राहत दिलाने के लिए पशु को अकार्डीकल दवा दी चाहती है। 

 

थनैला रोग और इलाज

थनैला रोग गाय के थनों से जुड़ा हुआ है। इस दौरान पशु के थन का आकार बड़ा हो जाता है और गाय के दूध निकालने का रास्ता छोटा हो जाता है। इसके अलावा दूध के साथ पस और खून भी निकलने लगता है। थनैला रोग का उपचार केवल समय रहते ही किया जा सकता है। पशु को इस रोग से बचाने के लिए समय – समय पर डॉक्टर से दूध की जांच कराएं। 

 

तिल्ली रोग और इलाज

तिल्ली रोग पशु को खराब खाना पीना देने से होता है। इस रोग के दौरान पशु शरीर से लुक जैसा रक्त बहने लगता है। इसके अलावा पशु को बुखार भी होता है और शरीर भी अकड़ने लगता है। इस रोग का इलाज केवल यही है कि पशु को खाना पीना साफ सुथरा दिया जाए।

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जानिए गाय और भैंस को मोटा तगड़ा करने के जबरदस्त उपाय

एक स्वस्थ और तंदुरुस्त पशु न केवल लंबे समय तक जीवित रहता है। बल्कि उसकी दूध उत्पादन क्षमता भी अधिक होती है। यही नहीं एक दुबला पतली गाय या भैंस  को बीमारी लगने का खतरा भी अधिक रहता है। यही कारण भी है जिसकी वजह से अक्सर पशुपालक ऐसे आहार या चारे के बारे में जानना चाहते हैं।

जिसके जरिए गाय और भैंस मोटी तगड़ी हो जाएं। क्या आप भी ऐसे ही आहार और उपाय के बारे में जानना चाहते हैं। अगर हां तो बता दें कि आज आपकी यह खोज पूरी होने वाली है। आज हमारे इस लेख में हम आपको बताएंगे कि आप अपनी गाय भैंस को मोटा तगड़ा कैसे बना सकते हैं। गाय को मोटा तगड़ा करने के इन उपाय को जानने के लिए लेख को अंत तक पढ़ें। 

गाय और भैंस को मोटा तगड़ा बनाने के उपाय 

शारीरिक रूप से मजबूत इंसान हो या गाय दोनों ही अधिक मेहनत कर सकते हैं। यही नहीं शारीरिक रूप से मजबूत पशुओं के जरिए प्राप्त खाद्य सामग्री की गुणवत्ता भी बेहतर होती है। इसलिए पशुपालक भाइयों के लिए जरूरी है कि वह अपनी गाय और भैंस को मोटा तगड़ा बनाएं। अब हम आपको नीचे पशु को मोटा तगड़ा बनाने के कुछ घरेलू उपाय और नुस्खे बता रहे हैं। जिन्हें आप आजमा सकते हैं। 

पशु के लिए बाई फैट 

गाय भैंस को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए और उनकी क्षमता को बेहतर करने के लिए बाई फैट देना फायदेमंद हो सकता है। यह पशु का आहार है जो आपको आपके आस पास की कई दुकानों पर मिल जाएगा। इस बाई फैट को आप अच्छी तरह रोस्ट करके अपनी गाय और भैंस को नियमित रूप से दे सकते हैं।

आप शुरुआत में बाई फैट केवल रोजाना 100 ग्राम ही दें। बाद में इसकी मात्रा को 600 ग्राम तक कर दें। ऐसा कहा जाता है कि बाई फैट देने के कुछ ही समय बाद गाय और भैंस का शारीरिक रूप से मजबूत और मोटी तगड़ी होने लगती है। इसके अलावा पशु को रोजाना इसे देने से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर हो जाती है। 

गाय भैंस को दें बिनौले 

अक्सर पशुपालक और किसान कहते नजर आ जाते हैं कि हरियाणा की गाय भैंस बहुत मोटी और तगड़ी होती हैं। इसके साथ ही यहां के पशु की त्वचा भी बेहद चमकदार होती है। आपको बता दें ऐसा इसलिए है, क्योंकि हरियाणा के लोग अपनी गाय और भैंस को बिनौला खिलाते हैं। आप भी भैंस या गाय को मोटा और तगड़ा करने के लिए बिनौला खिला सकते हैं।

लेकिन ध्यान रहे कि किसी भी सूरत में पशु को कच्चा बिनौला न खिलाएं। ऐसा करने से पशु की तबीयत बिगड़ सकती है। वहीं बिनौला भी रोस्ट या अच्छी तरह पका कर ही पशु को खिलाएं। अगर आप रोजाना ऐसा करते हैं तो इससे कुछ ही समय में आपकी गाय और भैंस मोटी तगड़ी हो जाएंगी। 

सोयाबीन से होगी भैंस मोटी तगड़ी 

किसान और पशुपालक भाई अगर अपनी गाय भैंस को बाईपास फैट और बिनौले नहीं दे पा रहे, तो वह उन्हें सोयाबीन खाने को दे सकते हैं। आपको बता दें कि सोयाबीन किसी भी साधारण दुकान से मिल जाएगी। सोयाबीन को रोजाना पशु को अच्छी तरह रोस्ट करके खिलाएं। आप शुरुआत में गाय या भैंस को केवल 100 ग्राम ही सोयाबीन खिलाएं। इसके बाद धीरे – धीरे उन्हें इसकी अधिक मात्रा देना शुरू करें। ऐसा करने से गाय भैंस मोटी तगड़ी हो जाएंगी। 

सरसों का तेल और दाना

गाय और भैंस को तगड़ा करने का सबसे बेहतर और आसान तरीका है कि आप उसे सरसों के तेल के साथ दाना और खल देना शुरू करें। अगर आप रोजाना सुबह शाम पशु को सरसों का तेल और दाना देते हैं तो इससे पशु में शारीरिक बदलाव देखने को मिलेंगे। इसके सेवन से पशु जल्दी ही मोटा तगड़ा हो जाएगा। 

किसान और पशुपालक भाई इस ब्लॉग पर पढ़ी गई जानकारी को ऐप के माध्यम से भी पड़ सकते हैं। हमारे द्वारा तैयार की गई Animall App न केवल आपको पशु स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करेगी। बल्कि आप पशु खरीदने और बेचने के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। यही नहीं पशु चिकित्सक से राय लेने के लिए भी आप इस ऐप का इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आप Animall App डाउनलोड करने की सोच रहे हैं तो आप इस लिंक पर क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं। 

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कैसे लाये अपनी गाय या भैंस को हीट में ?

पशुओं के गर्मी में ना आने के कारण

  • मादा गर्मी के लक्षण तब नहीं दिखा सकती है जब वह बहुत बूढ़ी हो या वह बिना मालिक के ज्ञान के मेल-मिलाप हो जाए I
  • कभी-कभी पशु किसी भी संकेत के बिना गर्मी में आते हैं इसे “चुप्प गर्मी” कहा जाता है और भैंसों में ये आम तौर पर पायी जाती है ।
  • यदि फ़ीड पर्याप्त नहीं है या प्रोटीन, लवण या पानी की कमी है, तो पशु गर्मी में आने में विफल हो सकता है। गर्मी में लाने के लिए आपको मादा की फीड में सुधार करने की आवश्यकता होगी।
  • पशुओं के पेट में कीड़ों क होना या बच्चेदानी में संक्रमण के कारण भी पशु गर्मी में नहीं आते I

पशुओं को गर्मी में लाने के लिए देशी इलाज

  • “बड़ा गोखरू (पेडलियम म्युरेक्स)” 500 ग्राम किण्वित चावल के पानी के 1000 मिलीलीटर में धोया जाता है जो एक तेलीय उत्सर्जन प्रदान करता है। यह पशुओं के मदकाल की शुरुआत से तीन दिन पहले मौखिक रूप से दिया जाता है। स्पष्ट योनि स्राव को देखने के बाद पशु को टीका लगवाया जा सकता है I

बड़ा गोखरू

  • “अश्वगंधा” (विदेनिया सोमनीफेरा) के राइज़ोम्स 150 ग्राम, जिन्जेली बीज 150 ग्राम को अच्छी तरह से 2 मुर्गी के अण्डों और 2 केले के फलों में मिलाकर पेस्ट तैयार करें और पशु को 7 दिनों के लिए दें I यदि पशु तब भी गर्मी में नहीं आता तो 7 दिनों के अंतराल पर फिर से इलाज (केवल 1 दिन के लिए) दोहराएं।

अश्वगंधा

  • पशुओं को गर्मी में लाने के लिए प्रजना या जनोवा नामक गोलियों का सेवन करायें I ये गोलियां केवल पशु चिकित्सक की निगरानी में अपने पशु को दें I

 

अन्य नुस्खे

  • यदि गाय या भैंस गर्मी में नही आती है तो कुछ गर्म पदार्थ खिलाना चाहिए। जैसे बाजरा, भूसी, खली, मसूर, चुन्नी, अरहर, अण्डा कबूतर का मल इत्यादि। ये सब खिलाने से जानवर को अवश्य ही लाभ मिलेगा।
  • इसके साथ ही साथ खनिज मिश्रण पर्याप्त मात्रा में (20 से 30 मिलीग्राम प्रतिदिन 20 दिनों के लिए) पशु के आहार में जरूर सम्मिलित करना चाहिए।
  • कभी भी गाय या भैंस को गाभिन (टीका लगवाने) कराने के बाद ठण्ड में या छाया वाले स्थान पर रखना चाहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि गाभिन होने के तुरन्त बाद जानवर को बैठने नहीं देना चाहिए, क्योंकि गाभिन होने के तुरन्त बाद बैठ गया तो सारा वीर्य बाहर निकल जाएगा और वो गाभिन नहीं हो पायेगी। गाभिन होने पर जानवर को कुछ ठण्डा चारा खिलाना चाहिए। जैसे चरी, पुआल, बरसीम, जौ, उर्द, चुन्नी इत्यादि।
  • पशुओं को हर 3 महीने बाद पेट के कीड़ों की दवाई दें I
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