पशुओं में अफारा होने के क्या लक्षण है?

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आम लक्षण निम्नलिखित है:-
(क) ज्यादा मात्रा में गीला हरा चारा, मूली, गाजर आदि यदि सड़ी हुई है|
(ख) आधा पका ल्पूसरन बरसीम व जौ का चारा|
(ग) दाने में अचानक बदलाव|
(घ) पेट के कीड़ों में संक्रमण|
(ङ) जब पशु अधिक चारा खाने के बाद पानी पीए|

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बछड़ों- बछड़ियों को खीस कितना और कैसे पिलाना चाहिये?

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सबसे ध्यान देने योग्य बात है कि पैदा होने के बाद जितना जल्दी हो सके खीस पिलाना चाहिये। इसे गुनगुना (कोसा) कर के बछड़े के भार का 10 वां हिस्सा वज़न खीस कि मात्रा 24 घंटों में पिलाएं। जन्म के 24 घंटों के बाद बछड़े की आंतों की प्रतिरोधी तत्व (इम्यूनोग्लोब्यूलिन) को सीखने की क्षमता कम हो जाती है। और तीसरे दिन के बाद तों लगभग समाप्त हो जाती है। इसलिए बछडों को खीस पिलाना आवश्यक है।

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पशुओं की संक्रामक बीमारियों से रक्षा किस प्रकार की जा सकती है?

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(क) पशुओं को समय-समय पर चिकित्सक के परामर्श के अनुसार बचाव के टीके लगवा लेने चहिये।
(ख) रोगी पशु को स्वस्थ पशु से तुरन्त अलग कर दें व उस पर निगरानी रखें।
(ग) रोगी पशु का गोबर , मूत्र व जेर को किसी गढ़ढ़े में दबा कर उस पर चूना डाल दें।
(घ) मरे पशु को जला दें या कहीं दूर 6-8 फुट गढ़ढ़े में दबा कर उस पर चूना डाल दें।
(ड़) पशुशाला के मुख्य द्वार पर ‘फुट बाथ’ बनवाएं ताकि खुरों द्वारा लाए गए कीटाणु उसमें नष्ट हो जाएँ।
(च) पशुशाला की सफाई नियमित तौर पर लाल दवाई या फिनाईल से करें।

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घरेलू तरीके से भैंस का दूध कैसे बढाये ?

कई लोग अपने गाय और भैंसों से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए टीके आदि का सहारा लेतें हैं, यह पहले कारगर तो साबित होता है लेकिन कई बार इसका प्रभाव विपरीत भी पड़ जाता है.

किसान भाइयों आज हम इस लेख के माध्यम से आपको एक ऐसे रामबाण घरेलू उपाय के बारे में बताएंगे जो गाय और भैंस का दूध बढाने में कारगर साबित होता है. उपाय बहुत सरल है और आपको बहुत ही जल्द इसके नतीजे भी मिलने लगेंगे

 

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क्या अजोला से पशुओं में दूध बढ़ा सकते है ?

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अजोला में मौजूद पोषक तत्व पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। इसमें लगभग 30 प्रतिशत तक प्रोटीन की मात्रा होती है साथ ही लाइसिन, अर्जिनीन और मेथियोनीन से भरपूर है। अजोला में लिग्निन की सूक्ष्म मात्रा से पशुओं में पाचन सरलता से होता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि यूरिया की जगह अजोला का प्रयोग किया जाए तो फिर उत्पादन भी अच्छा होता है। क्योंकि इसमें नाइट्रोजन की मात्रा 30 फीसदी होती है, इसके अतिरिक्त खनिज भी अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं।

दूध उत्पादन में उपयोगी अजोला-

दूध उत्पादन में अजोला काफी उपयोगी है। इससे दूध में वसा की मात्रा बढ़ती है। अजोला के चलते दूध का उत्पादन बीस फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। संकर नस्लीय गायों में अजोला की सहायता से खर्च भी कम होता है साथ ही दूध का उत्पादन भी 35 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इसे राशन के साथ समान अनुपात में मिलाकर पशु को खिलाया जा सकता है। इस प्रकार महंगे राशन से खर्च कम किया जा सकता है।

शुद्ध प्रजाति का इस्तेमाल-

यदि अजोला की शुद्ध प्रजाति का इस्तेमाल किया जाए तो इससे अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसका अधिक उत्पादन लेने के लिए इसकी कटाई 1 सेमी. पर कर दें। भारत में अजोला की औसत लंबाई 2 से 3 सेमी. तक होती है।

महत्वपूर्ण तथ्य-

यदि अजोला की बात करें तो यह देश में चारा की उपलब्धता कम खर्च में बढ़ाई जा सकती है। इसे अधिक सरलता से बढ़ाया जा सकता है। इसे गाय, भैंस, बकरी आदि के लिए अच्छा चारा के रूप में दिया जा सकता है। इसे तालाब, नदी और गड्ढे में आसानी से उत्पादित किया जा सकता है। अजोला को रबी और खरीफ के मौसम में आसानी से उगा सकते हैं। यह रासायनिक खाद का एक विकल्प के तौर पर है। इसके उपयोग से पशुओं में बांझपन की समस्या में कमी लायी जा सकती है।

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कैसे उगाएं अजोला-

नेशनल रिसोर्स डेवलेपमेंट विधि के अनुसार इसे प्लास्टिक शीट के साथ 2 मी.X 2मी. X 0.2मी का क्षेत्र तैयार कर इसमें 15 किग्रा. तक उपजाऊ मिट्टी डालते हैं। फिर इसे 2 किग्रा. गोबर और 30 ग्राम सुपर फास्फेट डालते हैं। इसके बाद में पानी डालकर इसका स्तर 10 सेमी. तक पहुंचा दिया जाता है। अब अजोला की एक किग्रा. की मात्रा को डालते हैं। देखते ही देखते 10 से 15 दिन बाद अजोला की लगभग आधा किलो मात्रा मिलनी शुरु हो जाती है। अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए 20 ग्राम सुपर फास्फेट तथा एक किग्रा. की मात्रा हर पांच साल बाद डालनी चाहिए।

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