कृत्रिम गर्भाधान ( Artificial Insemination ) के लाभ क्या है?

उन्नत गुणवत्ता के सांड़ों का वीर्य दूरस्थ स्थानों पर प्रयोग करके पशु गर्भित करना।एक गरीब पशुपालक सांड को पाल नहीं सकता, कृत्रिम गर्भाधान से अपने मादा पशु को गर्भित करा कर मनोवांछित फल पा सकता है।
इस ढंग से बड़े से बड़े व भारी से भारी सांड के वीर्य से उसी नस्ल की छोटे कद की मादा को भी गर्भित कराया जा सकता है।
विदेश या दूसरे स्थानों पर स्थित उन्नत नस्ल के सांड़ों के वीर्य को परिवहन द्वारा दूसरे स्थानों पर भेजकर, पशु गर्भित कराये जा सकते हैं।
कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से वीर्य संग्रह किया जा सकता है। इस प्रकार एक सांड से वर्ष में कई हजार पशु गर्भित होंगे और इससे उन्नत सांडों की कमी का समाधान भी होगा।
रोग रहित परीक्षित सांडों के वीर्य प्रयोग से मादा को नर द्वारा यौन रोग नहीं फैलते।
यदि गर्भाधान कृत्रिम रूप से कराया जाए तो मादा यौन रोग से नर प्रभावित नहीं होगा क्योंकि सहवास नैसर्गिक नहीं होता।
कृत्रिम गर्भाधान करने से पहले जननेन्द्रियों का परीक्षण किया जाता है। जिससे नर या मादा में बांझपन समस्या का पता लगाया जा सकता है।
उन्नत सांड को चोट खाने या लंगड़ेपन के कारण मादा को गाभिन नहीं कर सकता, कृत्रिम गर्भाधान विधि द्वारा इसके वीर्य का उपयोग किया जा सकता है।
कृत्रिम गर्भाधान द्वारा मादा की गर्भधारण क्षमता में वृद्धि होती है क्योंकि कृत्रिम गर्भाधान अत्तिहिंमीकृत प्रणाली से 24 घन्टे उपलब्ध रहता है।
इस विधि के द्वारा प्रजनन व संतति परीक्षण का अभिलेख रखकर शोधकार्य किये जा सकते है।
गर्मी में आई मादा के लिए गर्भाधान हेतु सांड को तलाश नहीं करना पडूता। हिमकृति वीर्यं हर समय उपलब्ध होता है।
चोट खाई लूली-लंगड़ी मादा जो नैसर्गिता अभिजनन से गर्भित नहीं किये जा सकता परन्तु कृत्रिम गर्भाधान गर्भधारण कराया जा सकता है।
इच्छित प्रजाति, गुणों वाले सांड़ जैसे कि अधिक दूध उत्पादक अथवा कृषि हेतु शक्तिशाली अथवा दोहरे उद्देश्य प्रजाति से गर्भित करा कर इच्छित संतति प्राप्त कर सकते है।
यह नैसर्गिक अभिजनन से अधिक सस्ता है, क्योंकि उन्नत सांड़ों से नैसर्गिक अभिजनन हेतु आज जहां 100 से 150 रूपया प्रति सेवा व्यय करना पड़ता है, तथा स्वंय का श्रम व्यय अलग होता है, वही कृत्रिम गर्भाधान पद्धत्ति से प्रति 30 से 50 रूपये धनराशि व्यय करके द्वार पर ही सेवा उपलब्ध हो जाती है।
इस विधि से संकर प्रजाति या नयी प्रजाति तैयार की जा सकती है।
यह दुग्ध उत्पादन वृद्धि हेतु सर्वोत्तम साधन है क्योंकि संकर प्रजनन में प्राप्त बछिया जल्दी गर्मी पर आकर ढ़ाई वर्ष में ब्या जाती है तथा मौ से अधिक दूध देती है।

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