गर्मियों में गर्भाधान के लिए भैंसों का रखरखाव कैसे करें?

उत्तरी भारत में कुछ समय के दौरान अत्याधिक गर्मी होती है। भैंसों की त्वचा का रंग काल होने के कारण शरीर से ऊष्मा (गर्मी) निकलने में गायों की अपेक्षा मुशिकल होती है। भैंसों में त्वचा व अघस्त्व्क वसा कि सतह भी मोटी होती है तथा स्वेद (पसीने की) ग्रंथियां कम होती है। अतः भैंसों में त्वचा की अपेक्षा श्वसन तंत्र (साँस) द्वारा अधिक ऊष्मा (गर्मी) निकलती है। भैंसों में शांत मंद्काल (हीट) की समस्या आमतौर पर पाई गई है।
इस्ट्रोजन हार्मोन जो कि पशु के मद के व्यवहार को प्रभावित करता है, गर्मियों में तापमान अधिक होने के कारण इस हार्मोन की मात्रा कम हो जाती है। यदि मद के लक्षणों का पता चल भी जाता है तो पशु के शरीर का तापमान अधिक होने के करण गर्भाधान के बाद गर्भ नहीं ठहर पाता। क्योंकि वातावरण का तापमान बढ़ने से निषेचन की क्रिया तथा भ्रूण को भी क्षति पहुँच सकती है। ऐसा देखा गया है कि यदि गाय के शरीर का तापमान सामान्य से 0.9 डिग्री फारेनाईट अधिक हो तो गर्भाधान की दर में 13% तक कमी हो सकती है।
भैंसों मद की अवधि 21 दिन है तथा मद 10-12 घंटे तक रहता है। यदि मादा को मद समाप्त होने के 6 घंटे पहले या समाप्त होने के कुछ देर बाद गर्भधान कराया जाए तो गर्भधारण की संभावना काफी बढ़ जाती है।
भैंसों के मद का प्रदर्शन गर्मियों में कम समय के लिए होता है। कभी-कभी लक्षण दिखाई ही नहीं देते। मद के लक्षण अधिकतर दिन में कम तथा रात में अधिक दिखाई देते हैं। अतः मद के लक्षणों की पहचान के लिए भैंसों का ध्यान रखना चाहिए। शेल्ष्मा स्त्राव कम मात्रा में होता है या होता ही नहीं। भैंस तेज आवाज में रंभाती है। भैंसों में टीजर सांड का प्रयोग काफी प्रभावशाली रहता है। पशु बेचैन रहता है तथा शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
ब्यौने के बाद गर्भाशय को सामान्य अवस्था में आने में डेढ़ से दो माह का समय लग जाता है। अतः व्यौने के 60-90 दिनों के अंदर भैंस का गर्भाधान करना चाहिए} व्यौने के 45 दिनों तक मद के लक्षणों को देखना चाहिए। मद के लक्षण दिखाई देने पर गर्भाधान कराना चाहिए। यदि भैंस 90 दिन तक मद में न आये तो तो उसका इलाज कराना चाहिए। यदि तीन बार गर्भाधान कराने पर भी पशु गर्भित न हो तो उसे रिपीट ब्रीडर कहते हैं। पशु को मड में न आना या गर्भ न ठहरना, या गर्भ ठहरने के बाद गर्भपात हो जाना भी रिपीट ब्रीडिंग है।
गर्मियों में भैंसों को गर्म हवा से बचाना चाहिए। भैंसों के लिए गर्मियों में तालाब की व्यवस्था होनी चाहिए जोकि भैंसों से बचाने का सबसे अच्छा उपाय है। यदि तालाब की व्यवस्था न हो तो गर्मियों में भैंसों को तीन चार दिन बाद पानी नहलाना चाहिए तथा छायादार स्थान पर रखना चाहिए। पशुशाला में गर्म हवाओं से बचाव के लिए कीटनाशक घोल (मैलाथियान 0. 5-1%) का पशु तथा पशु आवास में 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव् करें। 6 महीने से कम उम्र के पशुओं पर छिड़काव् न हो तथा ध्यान रखे की कीटनाशक पशु आहार या पीने के पानी में न मिले।
गर्मियों में भैंसों के खान-पान का ख्याल रखें क्योंकि तापमान बढ़ने पर पशु कम चारा खाता है। हर चारा खिलाएं। अधिक उर्जायुक्त पदार्थ देने चाहिए क्योंकि गर्म के दौरान शुष्क पदार्थ अंतर्ग्रहण की क्षतिपूर्ति हो सके।
इसके लिए दाने की मात्रा बढ़ा सके। लेकिन दाना शुष्क पदार्थ के 55-60% से अधिक नहीं होना चाहिए। नहीं तो दूध में वसा में कमी, अम्लरक्तता, पशु द्वारा कम चारा खाने आदि की समस्या हो सकती है। चारा सुबह व शाम के समय दें। दिन में जब तापमान अधिक हो तो चारा नहीं देना चाहिए। आहार में रेशें की मात्रा गर्मी बढ़ाती है लेकिन पर्याप्त मात्रा में रेशा भोजन को आमाशय में पचाने के लिए जरुरी है। कुल अपक्व (क्रूड) प्रोटीन की मात्रा 17% से अधिक नहीं नहीं चाहिए।
गर्मियों में भैंसों में पीने की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। ओआबू साफ व ठंडा होना चाहिए। गर्मी से तनाव में भैंसों के शरीर में पानी का संतुलन, आयन-संतुलन तथा अम्ल व क्षार का संतुलन बनाए रखने में खनिज तत्व सोडियम व् पोटेशियम महत्वपूर्ण हैं। दैनिक आहार में पोटेशियम की मात्रा 1.2-1.5% तथा सोडियम 0.45 से 0.55% तक होना चाहिए।
भैंसों को प्रतिरोधक (बफर) का घोल भी देना चाहिए जिससे अम्लरक्तता (एसिडोसिस) से भैंसों का बचाव होता है। ऐसा देखा गया है कि यदि भैंसों को ब्योने से पहले 60 दिन तथा 90 दिन ब्यौने के बाद तक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन ई, विटामिन ए, जिंक, कॉपर आयद संपूरक के रूप में दिए जाएँ तो प्रजनन क्षमता बेहतर होती है तथा बीमारियों के होने की संभावना भी बेहतर दिखाई देते हैं तथा गर्मी का गर्भाधान पर असर भी कम होता है। गर्मियों में नियासिन ६ ग्राम प्रतिदिन देने से भी उत्पादन पर अच्छा प्रभाव देखा गया है।
नियतकालीन कृत्रिम गर्भाधान की विधि का प्रयोग किया जा सकता है। इसमें मद के लक्षणों को देखने की आवश्यकता नहीं होती। इस विधि में पशु को निश्चित समय पर हार्मोन के टीके लगाकर निशिचत समय पर गर्भाधान किया जाता है। वीर्य हमेशा सही जगह से ही लेना चाहिए। गर्मियों में भैंसों को ऐसे वीर्य से गर्भित कराएँ जो ठंडे तापमान में संरक्षित किया गया हो। गर्भाधान हमेशा प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा ही करवाना चाहिए।

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Northern India experiences extreme heat during some time. Due to the skin color of buffaloes, it is more difficult than cows to release heat (heat) from the body. The surface of skin and non-fat fat in buffaloes is also thick and the sweat (sweat) glands are less. Therefore, buffalo produce more heat (heat) through the respiratory system (breath) than skin. In buffaloes, the problem of quiet heat (heat) is commonly found.
Estrogen hormone, which affects the behavior of an animal item, reduces the amount of this hormone as the temperature is higher in summer. If the symptoms of the item are known, then due to the high temperature of the animal, the womb cannot stop after conception. Because the temperature of the environment can cause fertilization and damage to the fetus. It has been observed that if the cow's body temperature is 0.9 degrees F above normal, the rate of conception can be reduced by 13%.
The duration of the buffalo item is 21 days and the item lasts for 10–12 hours. If the female is conceived 6 hours before the end of the item or shortly after the termination, the chances of conception increase significantly.
Buffalo items are exhibited for short periods in summer. Sometimes symptoms do not appear. The symptoms of the item are mostly less during the day and more at night. Hence buffalo should be taken care of to identify the symptoms of the item. There is little or no Shelma secretion. The buffalo cries in a loud voice. The use of teaser bull in buffalo is quite effective. The animal remains restless and body temperature rises.
It takes about one and a half to two months for the uterus to return to normal after its description. Therefore, buffalo should be conceived within 60-90 days of sexual intercourse. Conception should be done when symptoms of the item appear. If the buffalo does not come under the item for 90 days, then it should be treated. If the animal is not pregnant even after three times the conception, it is called a repeat breeder. Repeat breeding is also to prevent the animal from getting into the mud or not getting pregnant, or miscarriage after pregnancy.
In summer, buffalo should be protected from hot air. For the buffaloes, there should be a pond in the summer, which is the best way to protect it from buffalo. If there is no arrangement of the pond, then in summer, buffalo should be bathed after three to four days and kept in a shady place. Spray insecticide solution (Malathion 0. 5-1%) in animal and animal habitat at 15 days interval to protect against hot winds in the cattle shed. Animals below 6 months of age should not be sprayed and ensure that pesticides are not found in animal feed or drinking water.
Take care of buffalo's food in summer as the animal eats less fodder as the temperature rises. Feed every feed More energetic substances should be given as the dry matter can compensate for ingestion during hot.
For this, we can increase the amount of grain. But granule should not contain more than 55-60% of the dry matter. Otherwise, there may be problem of reduction in fat in milk, acidosis, eating less feed by the animal etc. Feed in the morning and evening. Fodder should not be given when the temperature is high during the day. The amount of fiber in the diet increases heat, but sufficient amount of fiber is necessary to digest food in the stomach. The total amount of crude protein should not exceed 17%.
In summer, the requirement of drinking in buffalo also increases. Oabu should be clean and cold. The mineral elements sodium and potassium are important in maintaining the balance of water, ion-balance and acid and alkali in buffalo's body under stress from heat. Potassium should be 1.2-1.5% in daily diet and sodium should be from 0.45 to 0.55%.
Buffaloes should also be given a buffer solution that protects the buffalo from acidosis. It has been observed that if buffaloes are given micronutrients such as vitamin E, vitamin A, zinc, copper, etc. as supplementary, 60 days before and 90 days after fertilization, fertility improves and diseases Chances of getting better also appear better and the effect of heat on conception is less. A good effect on production has also been observed by giving Niacin 4 grams per day in summer.
The method of periodic artificial insemination can be used. There is no need to look for the symptoms of the item. In this method, the animal is fertilized at a certain time by applying hormone vaccines at a fixed time. Semen should always be taken from the right place. In the summer, buffalo are impregnated with semen that has been preserved in cold temperatures. Conception should always be done by trained person.