बछड़ा कैसे तैयार करें?

जन्म के ठीक बाद बछड़े के नाक और मुंह से कफ अथवा श्लेष्मा इत्यादि को साफ करें।
आमतौर पर गाय बछड़े को जन्म देते ही उसे जीभ से चाटने लगती है। इससे बछड़े के शरीर को सूखने में आसानी होती है और श्वसन तथा रक्त संचार सुचारू होता है। यदि गाय बछड़े को न चाटे अथवा ठंडी जलवायु की स्थिति में बछड़े के शरीर को सूखे कपड़े या टाट से पोंछकर सुखाएं। हाथ से छाती को दबाकर और छोड़कर कृत्रिम श्वसन प्रदान करें।
नाभ नाल में शरीर से 2-5 सेमी की दूरी पर गांठ बांध देनी चाहिए और बांधे हुए स्थान से 1 सेमी नीचे से काट कर टिंक्चर आयोडीन या बोरिक एसिड अथवा कोई भी अन्य एंटिबायोटिक लगाना चाहिए।
बाड़े के गीले बिछौने को हटाकर स्थान को बिल्कुल साफ और सूखा रखना चाहिए।
बछड़े के वजन का ब्योरा रखना चाहिए।
गाय के थन और स्तनाग्र को क्लोरीन के घोल द्वारा अच्छी तरह साफ कर सुखाएं।
बछड़े को मां का पहला दूध अर्थात् खीस का पान करने दें।
बछड़ा एक घंटे में खड़े होकर दूध पीने की कोशिश करने लगता है। यदि ऐसा न हो तो कमजोर बछड़े की मदद करें।
बछड़े का भोजन (Feeding Calves)
नवजात बछड़े को दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे जरूरी आहार है मां का पहला दूध, अर्थात् खीस। खीस का निर्माण मां के द्वारा बछड़े के जन्म से 3 से 7 दिन बाद तक किया जाता है और यह बछड़े के लिए पोषण और तरल पदार्थ का प्राथमिक स्रोत होता है। यह बछड़े को आवश्यक प्रतिपिंड भी उपलब्ध कराता है जो उसे संक्रामक रोगों और पोषण संबंधी कमियों का सामना करने की क्षमता देता है। यदि खीस उपलब्ध हो तो जन्म के बाद पहले तीन दिनों तक नवजात को खीस पिलाते रहना चाहिए।

जन्म के बाद खीस के अतिरिक्त बछड़े को 3 से 4 सप्ताह तक मां के दूध की आवश्यकता होती है। उसके बाद बछड़ा वनस्पति से प्राप्त मांड और शर्करा को पचाने में सक्षम होता है। आगे भी बछड़े को दूध पिलाना पोषण की दृष्टि से अच्छा है लेकिन यह अनाज खिलाने की तुलना में महंगा होता है। बछड़े को दिए जाने वाले किसी भी द्रव आहार का तापमान लगभग कमरे के तापमान अथवा शरीर के तापमान के बराबर होना चाहिए।

बछड़े को खिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बरतनों को अच्छी तरह साफ रखें। इन्हें और खिलाने में इस्तेमाल होने वाली अन्य वस्तुओं को साफ और सूखे स्थान पर रखें।

पानी का महत्व

ध्यान रखें हर वक्त साफ और ताजा पानी उपलब्ध रहे। बछड़े को जरूरत से ज्यादा पानी एक ही बार में पीने से रोकने के लिए पानी को अलग-अलग बरतनों में और अलग-अलग स्थानों में रखें।

खिलाने की व्यवस्था

बछड़े को खिलाने की व्यवस्था इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस प्रकार का भोज्य पदार्थ दिया जा रहा है। इसके लिए आमतौर पर निम्नलिखित व्यवस्था अपनाई जाती है:

बछड़े को पूरी तरह दूध पर पालना
मक्खन निकाला हुआ दूध देना
दूध की बजाए अन्य द्रव पदार्थ जैसे ताजा छाछ, दही का मीठा पानी, दलिया इत्यादि देना
दूध के विकल्प देना
काफ स्टार्टर देना
पोषक गाय का दूध पिलाना।
पूरी तरह दूध पर पालना

50 किलो औसत शारीरिक वजन के साथ तीन महीने की उम्र तक के नवजात बछड़े की पोषण आवश्यकता इस प्रकार है:
सूखा पदार्थ (डीएम) 1.43 किग्रा

पचने योग्य कुल पोषक पदार्थ (टीडीएन) 1.60 किग्र

कच्चे प्रोटीन 315 ग्राम

यह ध्यान देने योग्य है कि टीडीएन की आवश्यकता डीएम से अधिक होती है क्योंकि भोजन में वसा का उच्च अनुपात होना चाहिए। 15 दिनों बाद बछड़ा घास टूंगना शुरू कर देता है जिसकी मात्रा लगभग आधा किलो प्रतिदिन होती है जो 3 महीने बाद बढ़कर 5 किलो हो जाती है।
इस दौरान हरे चारे के स्थान पर 1-2 किलो अच्छे प्रकार का सूखा चारा (पुआल) बछड़े का आहार हो सकता है जो 15 दिन की उम्र में आधा किलो से लेकर 3 महीने की उम्र में डेढ किलो तक दिया जा सकता है।
3 सप्ताह के बाद यदि संपूर्ण दूध की उपलब्धता कम हो तो बछड़े को मक्खन निकाला हुआ दूध, छाछ अथवा अन्य दुग्धीय तरल पदार्थ दिया जा सकता है।
बछड़े को दिया जाने वाला मिश्रित आहार
बछड़े का मिश्रित आहार एक सांद्र पूरक आहार है जो ऐसे बछड़े को दिया जाता है जिसे दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों पर पाला जा रहा हो। बछड़े का मिश्रित आहार मुख्य रूप से मक्के और जई जैसे अनाजों से बना होता है।
जौ, गेहूं और ज्वार जैसे अनाजों का इस्तेमाल भी इस मिश्रण में किया जा सकता है। बछड़े के मिश्रित आहर में 10% तक गुड़ का इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक आदर्श मिश्रित आहार में 80% टीडीएन और 22% सीपी होता है।
नवजात बछड़े के लिए रेशेदार पदार्थ
अच्छे किस्म के तनायुक्त पत्तेदार सूखे दलहनी पौधे छोटे बछड़े के लिए रेशे का अच्छा स्रोत हैं। दलहन, घास और पुआल का मिश्रण भी उपयुक्त होता है।
धूप लगाई हुई घास जिसकी हरियाली बरकरार हो, विटामिन-ए, डी तथा बी-कॉम्प्लैक्स विटामिनों का अच्छा स्रोत होती है।
6 महीने की उम्र में बछड़ा 1.5 से 2.5 किग्रा तक सूखी घास खा सकता है। उम्र बढने के साथ-साथ यह मात्रा बढ़ती जाती है।
6-8 सप्ताह के बाद से थोड़ी मात्रा में साइलेज़ अतिरिक्त रूप से दिया जा सकता है। अधिक छोटी उम्र से साइलेज़ खिलाना बछड़े में दस्त का कारण बन सकता है।
बछड़े के 4 से 6 महीने की उम्र के हो जाने से पहले तक साइलेज़ को रेशे के स्रोत के रूप में उसके लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
मक्के और ज्वार के साइलेज़ में प्रोटीन और कैल्शियम पर्याप्त नहीं होते हैं तथा उनमें विटामिन डी की मात्रा भी कम होती हैं।
पोषक गाय के दूध पर बछड़े को पालना

2 से 4 अनाथ बछड़ों को दूध पिलाने के लिए उनकी उम्र के पहले सप्ताह से ही कम वसा-युक्त दूध देने वाली और दुहने में मुश्किल करने वाली गाय को सफलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है।
सूखी घास के साथ बछड़े को सूखा आहार जितनी कम उम्र में देना शुरू किया जाए उतना अच्छा। इन बछड़ों का 2 से 3 महीने की उम्र में दूध छुड़वाया जा सकता है।
बछड़े को दलिए पर पालना

बछड़े के आरंभिक आहार (काफ स्टार्टर) का तरल रूप है दलिया। यह दूध का विकल्प नहीं है। 4 सप्ताह की उम्र से बछड़े के लिए दूध की मात्रा धीरे-धीरे कम कर भोजन के रूप में दलिया को उसकी जगह पर शामिल किया जा सकता है। 20 दिनों के बाद बछड़े को दूध देना पूरी तरह बंद किया जा सकता है।
काफ स्टार्टर पर बछड़े को पालना

इसमें बछड़े को पूर्ण दुग्ध के साथ स्टार्टर दिया जाता है। उन्हें सूखा काफ स्टार्टर और अच्छी सूखी घास या चारा खाने की आदत लगाई जाती है। 7 से 10 सप्ताह की उम्र में बछड़े का दूध पूरी तरह छुड़वा दिया जाता है।
दूध के विकल्पों पर बछड़े को पालना

यह अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए कि नवजात बछड़े के लिए पोषकीय महत्व की दृष्टि से दूध का कोई विकल्प नहीं है। हालांकि, दूध के विकल्प का सहारा उस स्थिति में लिया जा सकता है जब दूध अथवा अन्य तरल पदार्थों की उपलब्धता बिल्कुल पर्याप्त न हो।

दूध के विकल्प ठीक उसी मात्रा में दिए जा सकते हैं जिस मात्रा में पूर्ण दुग्ध दिया जाता है, अर्थात् पुनर्गठन के बाद बछड़े के शारीरिक वजन का 10%। पुनर्गठित दूध के विकल्प में कुल ठोस की मात्रा तरल पदार्थ के 10 से 12% तक होती है।

दूध छुड़वाना

बछड़े का दूध छुड़वाना सघन डेयरी फार्मिंग व्यवस्था के लिए अपनाया गया एक प्रबन्धन कार्य है। बछड़े का दूध छुड़वाना प्रबन्धन में एकरूपता लाने में मदद करता है और यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक बछड़े को उसकी आवश्यकता अनुसार दूध की मात्रा उपलब्ध हो और दूध की बर्बादी अथवा दूध का आवश्यकता से अधिक पान न हो।
अपनाई गई प्रबन्धन व्यवस्था के आधार पर जन्म के समय, 3 सप्ताह बाद, 8 से 12 सप्ताह के दौरान अथवा 24 सप्ताह में दूध छुड़वाया जा सकता है। जिन बछड़ों को सांड के रूप में तैयार करना है उन्हें 6 महीने की उम्र तक दूध पीने के लिए मां के साथ छोड़ा जा सकता है।
संगठित रेवड़ में, जहां बड़ी संख्या में बछड़ों का पालन किया जाता है जन्म के बाद दूध छुड़ाना लाभदायक होता है।
जन्म के बाद दूध छुड़वाने से छोटी उम्र में दूध के विकल्प और आहार अपनाने में सहूलियत होती है और इसका यह फायदा है कि गाय का दूध अधिक मात्रा में मनुष्य के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होता है।
दूध छुड़वाने के बाद

दूध छुड़वाने के बाद 3 महीने तक काफ स्टार्टर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जानी चाहिए। अच्छे किस्म की सूखी घास बछड़े को सारा दिन खाने को देना चाहिए। बछड़े के वजन के 3% तक उच्च नमी वाले आहार जैसे साइलेज़, हरा चारा और चराई के रूप में घास खिलाई जानी चाहिए। बछड़ा इनको अधिक मात्रा में न खा ले इसका ध्यान रखना चाहिए क्योंकि इसके कारण कुल पोषण की प्राप्ति सीमित हो सकती है।

बछड़े की वृद्धि
बछड़े की वृद्धि वांछित गति से हो रही है या नहीं इसे निर्धारित करने के लिए वजन की जांच करें।

पहले 3 महीनों के दौरान बछड़े का आहार बहुत महत्वपूर्ण होता है।
इस चरण में बछड़े का खानपान अगर सही न हो तो मृत्यु दर में 25 से 30% की वृद्धि होती है।
गर्भवती गाय को गर्भावस्था के अंतिम 2-3 महीनों के दौरान अच्छे किस्म का चारा और सांद्र आहार दिया जाना चाहिए।
जन्म के समय बछड़े का वजन 20 से 25 किग्रा होना चाहिए।
नियमित रूप से कृमिनाशक दवाई दिए जाने के साथ-साथ उचित आहार दिए जाने से बछड़े की वृद्धि दर 10-15 किग्रा प्रति माह हो सकती है।
बछड़े के रहने के स्थान का महत्व
बछड़ों को अलग बाड़े में तब तक रखा जाना चाहिए जब तक कि उनका दूध न छुड़वा दिया जाए। अलग बाड़ा बछड़े को एक दूसरे को चाटने से रोकता है और इस तरह बछड़ों में रोगों के प्रसार की संभावना कम होती है। बछड़े के बाड़े को साफ-सुथरा, सूखा और अच्छी तरह से हवादार होना चाहिए। वेंटिलेशन से हमेशा ताजी हवा अन्दर आनी चाहिए लेकिन धूलगर्द बछड़ों के आंख में न जाएं इसकी व्यवस्था करनी चाहिए।

बछड़े के रहने के स्थान पर अच्छा बिछौना होना चाहिए ताकि आराम से और सूखी अवस्था में रह सकें। लकड़ी के बुरादे अथवा पुआल का इस्तेमाल बिछौने के लिए सबसे अधिक किया जाता है। बछड़े के ऐसे बाड़े जो घर के बाहर हों, आंशिक रूप से ढके हुए और दीवार से घिरे होने चाहिए ताकि धूप की तेज गर्मी अथवा ठंडी हवा, वर्षा और तेज हवा से बछड़े की सुरक्षा हो सके। पूरब की ओर खुलने वाले बाड़े को सुबह के सूरज से गर्मी प्राप्त होती है और दिन के गर्म समयों में छाया मिलती है। वर्षा पूरब की ओर से प्राय: नहीं होती।

बछड़े को स्वस्थ्य रखना
नवजात बछड़ों को बीमारियों से बचाकर रखना उनकी आरंभिक वृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और इससे उनकी मृत्यु दर कम होती है, साथ ही बीमारी से बचाव बीमारी के इलाज की तुलना में कम खर्च में किया जा सकता है। बछड़े का नियमित निरीक्षण करें, उन्हें ठीक तरह से खिलाएं और उनके रहने की जगह और परिवेश को स्वच्छ रखें।

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गर्मियों में गर्भाधान के लिए भैंसों का रखरखाव कैसे करें?

उत्तरी भारत में कुछ समय के दौरान अत्याधिक गर्मी होती है। भैंसों की त्वचा का रंग काल होने के कारण शरीर से ऊष्मा (गर्मी) निकलने में गायों की अपेक्षा मुशिकल होती है। भैंसों में त्वचा व अघस्त्व्क वसा कि सतह भी मोटी होती है तथा स्वेद (पसीने की) ग्रंथियां कम होती है। अतः भैंसों में त्वचा की अपेक्षा श्वसन तंत्र (साँस) द्वारा अधिक ऊष्मा (गर्मी) निकलती है। भैंसों में शांत मंद्काल (हीट) की समस्या आमतौर पर पाई गई है।
इस्ट्रोजन हार्मोन जो कि पशु के मद के व्यवहार को प्रभावित करता है, गर्मियों में तापमान अधिक होने के कारण इस हार्मोन की मात्रा कम हो जाती है। यदि मद के लक्षणों का पता चल भी जाता है तो पशु के शरीर का तापमान अधिक होने के करण गर्भाधान के बाद गर्भ नहीं ठहर पाता। क्योंकि वातावरण का तापमान बढ़ने से निषेचन की क्रिया तथा भ्रूण को भी क्षति पहुँच सकती है। ऐसा देखा गया है कि यदि गाय के शरीर का तापमान सामान्य से 0.9 डिग्री फारेनाईट अधिक हो तो गर्भाधान की दर में 13% तक कमी हो सकती है।
भैंसों मद की अवधि 21 दिन है तथा मद 10-12 घंटे तक रहता है। यदि मादा को मद समाप्त होने के 6 घंटे पहले या समाप्त होने के कुछ देर बाद गर्भधान कराया जाए तो गर्भधारण की संभावना काफी बढ़ जाती है।
भैंसों के मद का प्रदर्शन गर्मियों में कम समय के लिए होता है। कभी-कभी लक्षण दिखाई ही नहीं देते। मद के लक्षण अधिकतर दिन में कम तथा रात में अधिक दिखाई देते हैं। अतः मद के लक्षणों की पहचान के लिए भैंसों का ध्यान रखना चाहिए। शेल्ष्मा स्त्राव कम मात्रा में होता है या होता ही नहीं। भैंस तेज आवाज में रंभाती है। भैंसों में टीजर सांड का प्रयोग काफी प्रभावशाली रहता है। पशु बेचैन रहता है तथा शरीर का तापमान बढ़ जाता है।
ब्यौने के बाद गर्भाशय को सामान्य अवस्था में आने में डेढ़ से दो माह का समय लग जाता है। अतः व्यौने के 60-90 दिनों के अंदर भैंस का गर्भाधान करना चाहिए} व्यौने के 45 दिनों तक मद के लक्षणों को देखना चाहिए। मद के लक्षण दिखाई देने पर गर्भाधान कराना चाहिए। यदि भैंस 90 दिन तक मद में न आये तो तो उसका इलाज कराना चाहिए। यदि तीन बार गर्भाधान कराने पर भी पशु गर्भित न हो तो उसे रिपीट ब्रीडर कहते हैं। पशु को मड में न आना या गर्भ न ठहरना, या गर्भ ठहरने के बाद गर्भपात हो जाना भी रिपीट ब्रीडिंग है।
गर्मियों में भैंसों को गर्म हवा से बचाना चाहिए। भैंसों के लिए गर्मियों में तालाब की व्यवस्था होनी चाहिए जोकि भैंसों से बचाने का सबसे अच्छा उपाय है। यदि तालाब की व्यवस्था न हो तो गर्मियों में भैंसों को तीन चार दिन बाद पानी नहलाना चाहिए तथा छायादार स्थान पर रखना चाहिए। पशुशाला में गर्म हवाओं से बचाव के लिए कीटनाशक घोल (मैलाथियान 0. 5-1%) का पशु तथा पशु आवास में 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव् करें। 6 महीने से कम उम्र के पशुओं पर छिड़काव् न हो तथा ध्यान रखे की कीटनाशक पशु आहार या पीने के पानी में न मिले।
गर्मियों में भैंसों के खान-पान का ख्याल रखें क्योंकि तापमान बढ़ने पर पशु कम चारा खाता है। हर चारा खिलाएं। अधिक उर्जायुक्त पदार्थ देने चाहिए क्योंकि गर्म के दौरान शुष्क पदार्थ अंतर्ग्रहण की क्षतिपूर्ति हो सके।
इसके लिए दाने की मात्रा बढ़ा सके। लेकिन दाना शुष्क पदार्थ के 55-60% से अधिक नहीं होना चाहिए। नहीं तो दूध में वसा में कमी, अम्लरक्तता, पशु द्वारा कम चारा खाने आदि की समस्या हो सकती है। चारा सुबह व शाम के समय दें। दिन में जब तापमान अधिक हो तो चारा नहीं देना चाहिए। आहार में रेशें की मात्रा गर्मी बढ़ाती है लेकिन पर्याप्त मात्रा में रेशा भोजन को आमाशय में पचाने के लिए जरुरी है। कुल अपक्व (क्रूड) प्रोटीन की मात्रा 17% से अधिक नहीं नहीं चाहिए।
गर्मियों में भैंसों में पीने की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। ओआबू साफ व ठंडा होना चाहिए। गर्मी से तनाव में भैंसों के शरीर में पानी का संतुलन, आयन-संतुलन तथा अम्ल व क्षार का संतुलन बनाए रखने में खनिज तत्व सोडियम व् पोटेशियम महत्वपूर्ण हैं। दैनिक आहार में पोटेशियम की मात्रा 1.2-1.5% तथा सोडियम 0.45 से 0.55% तक होना चाहिए।
भैंसों को प्रतिरोधक (बफर) का घोल भी देना चाहिए जिससे अम्लरक्तता (एसिडोसिस) से भैंसों का बचाव होता है। ऐसा देखा गया है कि यदि भैंसों को ब्योने से पहले 60 दिन तथा 90 दिन ब्यौने के बाद तक सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कि विटामिन ई, विटामिन ए, जिंक, कॉपर आयद संपूरक के रूप में दिए जाएँ तो प्रजनन क्षमता बेहतर होती है तथा बीमारियों के होने की संभावना भी बेहतर दिखाई देते हैं तथा गर्मी का गर्भाधान पर असर भी कम होता है। गर्मियों में नियासिन ६ ग्राम प्रतिदिन देने से भी उत्पादन पर अच्छा प्रभाव देखा गया है।
नियतकालीन कृत्रिम गर्भाधान की विधि का प्रयोग किया जा सकता है। इसमें मद के लक्षणों को देखने की आवश्यकता नहीं होती। इस विधि में पशु को निश्चित समय पर हार्मोन के टीके लगाकर निशिचत समय पर गर्भाधान किया जाता है। वीर्य हमेशा सही जगह से ही लेना चाहिए। गर्मियों में भैंसों को ऐसे वीर्य से गर्भित कराएँ जो ठंडे तापमान में संरक्षित किया गया हो। गर्भाधान हमेशा प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा ही करवाना चाहिए।

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गाय की वैदिक खुराक से ढुध केसें बढ़ाए ?

5kg तारा
10kg सरसो
30 kg जौ
30 kg गेहु का दलिया
30 kg कपास के बनोले
20 kg चने
15 kg सोयाबीन;या मुंगी की दाल कै छिलका
5 kg गुड़
3 kg मेथीदाना
2 kg सुखे आवले
1 kg मीठा सोडा
250 g ज़ीरा
250 g सोंफ
1 kg साबुत लहसुन
यह गाय की एक महीने की खुराक है इसके तीस भाग कर लेने चाहिए ।

गाय को दूध बढ़ाने के लिए वैदिक खुराक की विधि:- तारामीरा , सरसौ, जौ, गेहु ,कपास के बिनोले, चने छिलका ओर मीठा सोडा को बारीक पीसकर उसका दलीया बना के पका कर ठंडा करके दिया जाना चाहिए है।

मेथी और आवला कौ बारीक पीसकर गुड डाल कर तीनो को छाछ में 12घंटे भिगोकर सरबत बना कर उन्हें शाम को गाऐ को देना है टोप कैलशियम तैयार हो गया जी शाम का दलिया मे मिलाकर देना चाहिए और सुबह नमक वाला देना चाहिए

गाय तो हर रोज 25-30 kg हरी घास(हरा चारा) पेट भर देना चाहिए!
2-3 kg सुखी तुड़ी देना जी!

खल तो खाद है खुराक नही है!!!!

ये सब गाय को कभी न खिलायो जैसे फीड तो जहर है चुरी तो कबाड हाेती है और घर का आटा जहर है!

कच्चा या गीला गेहूँ का आटा जहर हैक्योकि गाय को चार पेट होते है गाय को आटे की रोटी बनाकर दे सकते है।
आटा गाय के पेट मे जाकर आतौं काे चिपका देता है जब हम पेट मे कीडे की दवा देते है तो कीडे चीपे हुऐ कचे आटे में घुसकर अपनी जान बचा लेते हैं ऐसे वे मरते ही नहीं और दूध बढ़ने की क्षमता को 50% कम करता हैं!
– डॉ. रोहित बच्छराज – 9053596020

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पशुओं में फॉस्फोरस की कमी के लक्षण एवं उपचार क्या है ?

पशुओं के शरीर में फॉस्फोरस के अपर्याप्त मात्रा में अथवा शरीर द्वारा उचित रूप से प्रयोग न होने पर पशुओं में फास्फोरस की कमी हो जाती है. लगभग 70 प्रतिशत फॉस्फोरस हड्डी और दांत की संरचना बनाने के लिए कैल्शियम के साथ उपयोग होता है. फॉस्फोरस शरीर की कोशिकाओं के केन्द्रक एवं सभी ऊत्तकों के कोशिका द्रव्य की संरचना का महत्वपूर्ण तत्व हैं. यह कंकालतंत्र, तंत्रिकातंत्र एवं मांसपेशियों के ऊत्तकों का एक सार्वभौमिकतत्व है. रूधिरसीरभ में फास्फोरस की कम मात्रा से उत्पन्न होने वाले विकार को हाइपोफॉस्फेटीमिया के रूप् में जाना जाता है. पशुओं में अत्याधिक मात्रा में फॉस्फोरस की कमी के कारण हड्डियों का रोग, रिकेट्स हो सकता है. फॉस्फोरस एवं कैल्शियम के अनुचित संतुलन से पशुओें में ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है

फॉस्फोरस की कमी के कारणः-

1. आहार में फॉस्फोरस की कमी

(1) मिट्टी मृदा में फॉस्फोरस की कमी होना

(2) सूखी घास एवं चारे में फॉस्फोरस का स्वाभविक रूप से कम होना.

(3) सूखे की दशा स्थिति में, चारे में फॉस्फोरस की कमी उत्पन्न हो जाना

2. शरीर द्वारा फॉस्फोरस का अपर्याप्त अवशोषण

(1) दुधारू पशुओं में दूध/दुग्ध के साथ फॉस्फोरस का अधिक मात्रा में स्त्राव होना.

(2) अग्रिम गर्भावस्था के दौरान भ्रूण के विकास के लिए फॉर्स्फोरस की आवश्यकता में वृद्धि का होना

फॉस्फोरस की कमी के प्रकार

1. तीव्र :

तीव्र फॉस्फोरस की कमी सामान्यतः उच्च उत्पादकता वाली डेयरी गायों में स्तनपान की शुरूआती अवधि में अधिकतम पायी जाती है. स्तनपान की शुरूआत में फॉस्फोरस की अचानक से कमी होना शुरू हो जाती है. प्रसव्र की अवधि के आसपास पशु के आहार/चारा सेवन में कमी आना, फॉस्फोरस की कमी का एक बड़ा कारण माना जाता है.

2. जीर्ण

जीर्ण फास्फोरस की कमी पशुओं में आमतौर पर लंबे समय तक अपर्याप्त मात्रा में चारा लेने से उत्पन्न होती है एवं लम्बें समय तक पशुओं के आहार में फॉस्फोरस की कमी के कारण क्रोनिक फॉस्फोरस की कमी हो जाती है. इस प्रकार की फॉस्फोरस की कमी शुष्क क्षेत्र में चरने वाले पशुओं में पायी जाती है, क्योंकि इन स्थानों की मिट्टी में स्वभाविक रूप से फॉस्फोरस कम मात्रा में पाया जाता है.

3. अन्यः

फॉस्फोरस के बिना हाइपोफोस्फेटिमिया, इस प्रकार की फॉस्फोरस की कमीओरल एवं पेरेन्ट्र कार्बोहाइड्रेट सदेने के पश्चात कोशिकाओं द्वारा फॉस्फोरस के ग्लूकोज के साथ अधिक मात्रा में उपयोग की वजह के कारण फॉस्फोरस की कमी उत्पन्न हो जाती है.

प्रमुखलक्षण :

फॉस्फोरस की कमी से ग्रसित युवा पशुओं में, उत्सुकता, बेचैनी, मांसपेशियों में कमजोरी एवं हड्डियों में दर्द होना, लाल रूधिरकणिकाओं का अधिक संख्या में टूटने लगना, हाइपोफॉस्फेटीमिया में तंत्रिकातंत्र संबंधी लक्षण उत्पन्न होना, ह्दय गति एवं श्वासदरका बढ़ना, एटीपी की कमी के कारण श्वेतरक्तकणिकाओं एवं प्लेट्लेट्स के कार्य में शिथिलताआना, हाइपोफॉस्फेटीमिया के कारण दुधारू पशुओं में प्रसव के पश्चात पैरों पर खड़ा ना हो पाना, शिथिललेटेरहना.

जीर्ण फॉस्फोरस की कमी से ग्रसित युवा पशुओं में धीरे-धीरे वृद्धि होना, रिकेट्स उत्पन्न हो जाना एवं वयस्क पशुओं में शुरूआती अवधि में भूख लगना, सुस्त होना एवं वजन कम होना. बाद के चरणों में पशुओं में पाइका, ओस्टियोमलेशिया, असामान्य चाल, लंगड़ापन एवं अन्ततः अपने पैरों पर खड़े होने में असमर्थता उत्पन्न हो जाना प्रमुख लक्षण हैं.

पशुओं/गौंवशी पशुओं में लंबे समय तक फॉस्फोरस कैल्शियम, मैग्नीशियम या पोटेशियम की कमी के कारण होती है. इस स्थिति में पशु कैल्शियमलवण से उपचार के उपरान्त भी खड़ा नही होता.

निदान

1. इतिहास : अग्रिमगर्भवस्था / जल्दीस्तनपान

पशुओं को एकमात्र सूखा चारा खिलाना

2. लक्षणः कॉफी रंग के मूत्र का विर्सजन होना.

खून की कमी, पीलिया, यकृत एवं प्लीहा के आकार में वृद्धि होना.

3. जॉचे : (1) रूधिर : कम हीमोग्लोबिन, पीसीवी एवं टीईसी.

(2) बायोकैमिकलः सीरम में कम मात्रा में अकार्बानिक फॅास्फोरस

(3) मूत्रः मूत्र में हीमोग्लोबिन का पाया जाना

4. पशुओं के चारें एवं आहार की जांच.

5. मृदा में फॉस्फोरस की मात्रा की जांच.

शव परीक्षण

पशु का मृत शरीर दुबला-पतला, क्षीण अवस्था में होना. पसलियों, कंशेरूकाएं एवं श्रेणी टूटी हुई होना. तथा पशुओं के बाल खुरदरे होना.

पशु चिकित्सक द्वारा फॉस्फोरस की कमी से ग्रसित पशुओं की चिकित्सा निम्न प्रकार से की जा सकती है.

सोडियम एसिडफॉस्फेट अथवा वफरफॉस्फोरस का 50 मिग्रा0 इंजेक्शन पहलेदिन, दो-तीन दिन बाद 25 मिग्रा. का दूसरा इंजेक्शन, के साथ इलाज अत्याधिक प्रभावी होता है. खून की कमी की स्थिति में खून चढायें तथा मिनरल खनिज मिश्रण 25-50 ग्राम मात्रा में रोज पशु को खिलायें.

रोकथाम एवं नियंत्रण

पशुओं को आहार में संतुलित मात्रा में फॉस्फोरस उपलब्ध करायें.

मृदा में फॉस्फोरस की कमी को दूर करने के लिए फॉस्फोरस युक्त उर्वरक डालें.

गर्भावस्था के अन्तिम सप्ताह के दौरान आहार में अधिक मात्रा में फॉस्फोरस न दें, यह पशु के लिए प्राणघातक हो सकता है.

डॉ. रोहित बच्छराज – 9053596020

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