पशु खरीदते समय पशु की उम्र कैसे जानें ?

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एक किसान और पशुपालक की आय का बड़ा हिस्सा पशु के जरिए प्राप्त दूध एवं दूध से बने उत्पादों से ही आता है। ऐसे में पशुपालक पशु खरीदते समय उनके दूध की मात्रा का तो ख्याल करते हैं। लेकिन पशु की आयु के बारे में पता नहीं लगाते। जिसकी वजह से कई बार पशुपालक एक बूढ़ी गाय या भैंस खरीद लेते हैं। ऐसे में एक बूढ़ी गाय या भैंस कई बार कुछ ही महीनों में मर जाती है। जिसके चलते पशुपालक को आर्थिक नुकसान हो जाता है। इसलिए पशुपालक को हमेशा एक कम उम्र की ही गाय या भैंस खरीदनी चाहिए।

अब सवाल उठता है कि गाय या भैंस की उम्र का पता कैसे लगाया जाए। अगर आप भी ऐसे ही किसी सवाल से परेशान हैं तो आपकी इस समस्या का अंत हम अपने इस लेख में करने वाले हैं। हम इस लेख के माध्यम से न केवल आपको बताएंगे कि आप किस तरह गाय भैंस की उम्र का पता लगा सकते हैं। बल्कि यह भी बताएंगे कि गाय या भैंस का पूरा जीवन काल है वह कितने साल का होता है। इन सब के अलावा अगर आप एक सही पशु खरीदना या बेचना चाहते हैं तो यह ऑनलाइन कैसे कर सकते हैं, यह भी बताएंगे। 

गाय भैंस का पूरा जीवन काल कितना होता है 

एक पशुपालक को यह मालूम होना चाहिए कि एक भैंस या गाय की उम्र अधिकतम 20 से 22 साल ही हो सकती है। इस आयु के बाद भैंस का जीवित रहना बहुत ज्यादा मुश्किल होता है। अगर पशुपालक भैंस या गाय को खरीदने का विचार बना रहे हैं तो ध्यान रहे कि हमेशा कम उम्र का ही पशु खरीदें। 

गाय भैंस की उम्र पता लगाने का तरीका 

भैंस की उम्र कम है या अधिक यह उसके सामने के दांतों को देखकर पता लगाया जा सकता है। आपको बता दें कि भैंस के आगे 8 दांत होते हैं। भैंस की उम्र जब छोटी होती है, तो उसके दांतों का आकार तिकोना होता है। वहीं अगर भैंस युवावस्था में है तो उसके दांतों का आकार चौकोर होगा।  इसके अलावा दूध के दांत और बाद में आए दांतों में कई भिन्नताएं हो सकती हैं। आपको बता दें कि दूध के दांत दिखने में छोटे होते हैं। वहीं बाद में आए दांत बड़े होते हैं।  

पता हो कि भैंस के दांत जोड़ों में आते हैं। जब भैंस की आयु 2 साल होती है,तो उसके दूध के दो दांतों की जगह 2 स्थाई दांत आ जाते हैं। इसके बाद भैंस की आयु तीन साल के होने पर उसके 4 स्थाई दांत आ जाते हैं। वहीं जब भैंस की आयु 4 साल होती है, तो भैंस के 6 चौकोर दांत आ जाते हैं। भैंस की उम्र 5 साल होने पर भैंस के 8 दांत आ जाते हैं। यही प्रक्रिया भैंस के पूरे जीवन काल तक देखने को मिलती है। इसी तरह जब भैंस बूढ़ी हो जाती है तो स्थाई दांत भी घिसने लगते हैं। उम्र के साथ सभी स्थाई दांत भी घिस जाते हैं। पशुपालक भैंस के दांतों को देखकर उनकी आयु का अंदाजा लगा सकते हैं और यह तय कर सकते हैं कि उन्हें भैंस खरीदने हैं या नहीं। 

किसान और पशुपालक भाई जो भैंस या गाय की आयु को लेकर चिंतित हैं। वह पशु Animall App के जरिए खरीद सकते हैं। ऐप पर आपको पशु की आयु से लेकर उससे जुड़ी संपूर्ण जानकारियां मिल जाएंगी। यही नहीं अगर आप किसी पशु को बेचना चाहते हैं या किसी पशु को लेकर चिकित्सक की सलाह लेना चाहते हैं तो आप यह भी ऐप के जरिए कर सकते हैं। Animall App को डाउनलोड करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। 

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जानिए कैसे करें गाय के चिचड़ी का इलाज!

गाय और भैंस को पालने के दौरान पशुपालक वैसे तो कई चीजों का ध्यान रखते हैं। लेकिन कई बार उनकी छोटी सी चूक भी पशु को बड़ी समस्या में डाल देती है। ऐसी ही एक समस्या है जिसकी चपेट में ज्यादातर गाय और भैंस आ जाती हैं। हम बात कर रहे हैं गाय और भैंस में लगने वाली चिचड़ी और जूँ के बारे में।
यह छोटे – छोटे परजीवी न केवल गाय और भैंस के शरीर से लगातार खून चूसते रहते हैं। बल्कि यह उन्हे शारीरिक रूप से कमजोर भी बना देते हैं। इसके अलावा यह जूँ और चिचड़ी लगने की वजह से गाय और भैंस के दूध देने की क्षमता भी प्रभावित होती है। यही नहीं कई बार इन परजीवियों की वजह से पशु के बछड़ों और कटड़ों की जान तक चली जाती है। इसलिए आज हम यह लेख लेकर आए हैं। इस लेख में हम आपको गाय के चिचड़ी का इलाज कैसे करें, यह बताएंगे।  इसके अलावा जानेंगे कि किस तरह आप अपनी गाय को चिचड़ी और जूँ के प्रकोप से बचा सकते हैं। 

गाय पर चिचड़ी से होने वाला प्रभाव

एक पशुपालक या किसान को यह बात पता होनी चाहिए कि चिचड़ी और जूँ केवल पशु का खून नहीं चूसते। बल्कि इसका प्रभाव गाय के शरीर पर कई तरह से देखने को मिलता है जैसे – 

  1. गाय के शरीर पर चिचड़ी और जूँ होने से उन्हें कब्ज की समस्या हो सकती है। कब्ज एक ऐसी स्थिति है। जिसमें पशु को मल त्यागने में दिक्कत आती है।
  2. अगर गाय के शरीर पर लगी चिचड़ी का इलाज समय पर न कराया जाए तो इसकी वजह से एनीमिया की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस स्थिति में पशु के शरीर में खून की कमी होने लगती है। 
  3. चिचड़ी और जूँ के चलते गाय को पेट दर्द की समस्या भी रहने लगती है। 
  4. डायरिया की समस्या पशुओं में होने की एक मुख्य वजह जूँ और चिचड़ी होना है। 
  5. अगर चिचड़ी का इलाज समय पर न कराया जाए तो इसकी वजह से गाय के दूध देने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। यही नहीं गाय के बछड़ों की कई बार इनकी वजह से मौत तक हो जाती है।  

गाय के चिचड़ी का इलाज का तरीका 

गाय के शरीर पर लगने वाली जूँ और चिचड़ी का इलाज कई तरह से करते हैं। जिनमें से ज्यादातर इलाज या उपचार घरेलू ही होते हैं। लेकिन अगर घरेलू उपाय या उपचार काम न आए तो इस स्थिति में गाय को डॉक्टरी इलाज की जरूरत पड़ सकती है। गाय को चिचड़ी होने पर डॉक्टर अमूमन इन्हें कृमिनाशक दवा देते हैं। यह दवा पशुओं को लगभग साल में दो बार चिचड़ी से बचाव के लिए भी दी जाती है।

इसके अलावा गाय को चिचड़ी से राहत दिलाने के लिए आप चाहें तो कुछ देसी दवा का भी उपयोग कर सकते हैं। इसमें अगर आप कुछ समय तक गाय को नमक के पानी से साफ करेंगे तो इससे गाय को चिचड़ी से छुटकारा मिल जाएगा। लेकिन ध्यान रहे की गाय पर किसी भी दवा या उपाय केवल डॉक्टर की राय पर ही आजमाएं। वरना कई बार यह उपाय नुकसानदायक भी हो सकते हैं। 

 

गाय भैंस में जूँ, चिचड़ी, कलनी का देसी उपचार कैसे करें ?

गाय भैंस में जूँ, चिचड़ी क्यों होता है और कैसे रोकें ?

अगर आप भी अपनी गाय या भैंस की सेहत से जुड़ी समस्याओं के समाधान चाहते हैं, तो तुरंत ही Animall ऐप पर पशु चिकित्सक से बात करें। साथ ही अगर आप पशु खरीदना या बेचना चाहते हैं तो वो भी आप ऐप के जरिये कर सकते हैं।

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गाय-भैंस का ठंड जुकाम का घरेलू तरीके से कैसे इलाज करें?

प्रदेश में इस समय कड़ाके के ठंड पड़ रही है, अपने साथ ही अपने पालतू पशुओं के पास का भी खयाल रखना चाहिए।

ठंड के मौसम में पशुओं को कभी भी ठंडा चारा व दाना नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे पशुओं को ठंड लग जाती है। पशुओं को ठंड से बचाव के लिए पशुओं को हरा चारा व मुख्य चारा एक से तीन के अनुपात में मिलाकर खिलाना चाहिए।

ठंड के मौसम में पशुपालकों को पशुओं के आवास प्रबंधन पर विशेष ध्यान दें। पशुशाला के दरवाजे व खिड़कियों पर बोरे लगाकर सुरक्षित करें। जहां पशु विश्राम करते हैं वहां पुआल, भूसा, पेड़ों की पत्तियां बिछाना जरूरी है। ठंड में ठंडी हवा से बचाव के लिए पशु शाला के खिड़कियों, दरवाजे तथा अन्य खुली जगहों पर बोरी टांग दें। सर्दी में पशुओं को सुबह नौ बजे से पहले और शाम को पांच बजे के बाद पशुशाला से बाहर न निकालें।

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पशुओं में गर्भपात के कारण क्या क्या है?

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प्रसव के सामान्य काल से पूर्व गर्भ के नष्ट हो जाने को गर्भपात कहा जाता है। गाय तथा भैंसों में कई संक्रामक बीमारियों के कारण गर्भपात हो सकता है। पशुओं में गर्भपात के कारण न केवल नवजात बल्कि दूध का भी नुकसान होता है। इसके कारण किसान भाईयों को आर्थिक संकट होता है, गर्भपात का कोई निश्चित काल नहीं है यह गर्भकाल के किसी भी समय हो सकता है।

गौरतलब है कि अक्सर पहली तिमाही में हुए गर्भपात का पता नहीं चल पाता, क्योंकि इस समय तक भ्रूण का पूर्ण रूप से विकास नहीं हो पाता। विभिन्न प्रकार के जीवाणु, विषाणु, फफूंद व परजीवी भी पशुओं में भ्रूण की क्षति करते हैं। वैसे तो पशुओं में गर्भपात के अनेक कारण हैं पर कुछ प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्नलिखित है।

ब्रुसेल्लोसिस

यह रोग पशुओं में गर्भपात के प्रमुख कारणों में से एक है। यह रोग ब्रुसेल्ला नामक जीवाणु से होता है। ब्रुसेल्ला के संक्रमण के बाद गर्भपात गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में होता है उसके बाद पशुओं में जेर रुक जाती है, इसके अतिरिक्त यह जोड़ों में सूजन भी पैदा कर सकता है। यह संक्रमण स्वस्थ पशुओं में पहले से ही संक्रमित पशुओं के गर्भनाल, भ्रूण, योनि स्राव के संपर्क में आने से फैलता है। मुख्यत: यह अनुभव किया गया है कि इस संक्रमण के कारण पशु में एक ही बार गर्भपात होता है व अगली बार ब्यात बिलकुल सामान्य होती है, कई पशुुओं में जेर सही समय पर नहीं निकलती। यह रोग पशुओं से मनुष्यों में भी फ़ैल सकता है तथा बुखार एवं जोड़ों में दर्द का कारण हो सकता है। पशुओं में इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है।

ट्रायकोमोनियसिस

यह बीमारी ट्रायकोमोनास नमक प्रोटोजोआ के कारण होती है। इस संक्रमण से पशुओं में गर्भावस्था के प्रथम तिमाही में गर्भपात हो जाता है जिसके कारण पशु पालक को गर्भपात का पता नहीं चल पाता। गर्भपात के बाद गर्भाशय में मवाद बन जाती है, पशु बांझपन या अनियमित ऋतु चक्र के लक्षण दिखाता है। यह संक्रमण मादा पशुओं में संक्रमित नर के द्वारा प्रजनन के दौरान होता है। रोग के उपचार हेतु पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, बचाव हेतु कृत्रिम गर्भाधान की सलाह दी जाती है।

विब्रियोसीस

यह बीमारी विब्रियो नामक सूक्ष्म जीव से होती है, यह गर्भपात के साथ-साथ बांझपन व भ्रूणीय क्षय का भी कारण हो सकती है। यह बीमारी कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा गाभिन पशुओं में कम देखने को मिलती है, एंटीबायोटिक्स से इस बीमारी का समाधान किया जा सकता है।

गर्भपात के कुछ अन्य कारण

  • कोर्टीसोन, प्रेडनिसोलोन आदि के उपयोग से गाभिन पशु में गर्भपात हो सकता है।
  • संतुलित आहार एवं विटामिन व खनिज की कमी से।
  • अनेक संक्रमणों के कारण उत्पन्न ज्वर से भी पशुओं में गर्भपात हो सकता है।
  • गाभिन पशु को चोट लगने से।
  • प्रोजेस्ट्रोन हॉर्मोन की कमी से।
  • भ्रूण की नाल घूमने से।
  • गलत समय पर एवं अप्रशिक्षित व्यक्ति से जननांगों की जांच अथवा कृत्रिम गर्भाधान करवाने से।
  • जुड़वाँ बच्चों के कारण।
  • अनेक प्रकार के हरे चारे जैसे ज्वार, इसमें एस्ट्रोजन नामक हार्मोन की मात्रा अधिक होती है, गर्भावस्था के दौरान इस तरह के चारे का अधिक सेवन करने वाले पशुओं में गर्भपात हो सकता है।
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विब्रियोसीस (vibriosis) क्या है और इससे कैसा बचा सकते है?

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किसान या पशुपालन करने वाले ज्यादातर लोगों को कई बार आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। किसानों को होने वाले इस नुकसान के कई कारण हो सकते हैं, जैसे गाय की दूध उत्पादन क्षमता घटना, गाय का दूध दूषित होना या फिर गाय का गर्भपात होना आदि। आज हम अपने इस लेख में पशुपालक की इन्हीं समस्याओं में से एक के बारे में बात करने वाले हैं।

दरअसल हम बात कर रहे हैं गाय के गर्भपात होने की स्थिति के बारे में। पशुपालन से जुड़े लोग अक्सर देखते हैं कि, गाय का गर्भपात गर्भधारण करने के तीसरे महीने के आस पास होता है। आपको बता दें कि यह विब्रियोसिस नामक रोग के चलते होता है। आज हम जानेंगे कि इस रोग का कारण क्या है और आखिर किस तरह से पशु को इस रोग से बचाया जा सकता है।

क्या है विब्रियोसीस 

विब्रियोसीस एक ऐसा रोग है, जिसमें गर्भधारण करने के तीन महीने बाद पशु का गर्भपात हो जाता है। आपको बता दें कि विब्रियोसीस नामक यह रोग विब्रियो नाम के सूक्ष्म जीव के जरिए ही पैदा होता है। पशु को यह रोग अमूमन संक्रमित भैंसे या सांड से होता है। इस रोग की वजह से न केवल पशु का गर्भपात हो जाता है। बल्कि इसकी वजह से कई बार पशु पूरी तरह बांझपन का भी शिकार हो जाता है। 

विब्रियोसीस किस तरह का रोग है 

पशुपालन करने वाले भाइयों को बता दें कि यह बहुत ही संक्रामक रोग है जो बहुत तेजी से फैलता है। इस रोग के होने पर स्वस्थ पशुओं को संक्रमित पशु से दूरी पर बांध देना चाहिए। अगर ऐसा समय रहते न किया जाए, तो इसकी वजह से स्वस्थ पशु भी इस रोग की चपेट में आ सकते हैं। इसके अलावा पशुपालक इस बात का खास ध्यान रखें कि  किसी भी स्थिति में संक्रमित पशु का कम से कम 6 महीने तक गर्भधारण नहीं करवाना चाहिए। 

विब्रियोसीस रोग का उपचार और बचाव का तरीका 

किसान और पशुपालक भाई अपने पशु को इस रोग की चपेट में आने से बचा सकते हैं। इसके लिए पशुपालक पशु का केवल कृत्रिम गर्भाधान ही कराएं। ऐसा इसलिए क्योंकि यह रोग अमूमन एक संक्रमित भैंसे या सांड के संपर्क में आने से ही होता है। इसलिए हमेशा पशु का कृत्रिम गर्भाधान ही कराएं।

अगर आपका पशु इस गंभीर रोग से पीड़ित हो चुका है, तो आपको निश्चित रूप से चिकित्सक की सलाह की जरूरत पड़ेगी। ध्यान रहे कि किसी भी तरह की देसी दवा या उपाय इस समस्या का अंत नहीं कर सकता। आपको बता दें कि अमूमन डॉक्टर विब्रियोसीस की समस्या से पशु को छुटकारा दिलाने के लिए एंटीबायोटिक दी जाती है। अगर आप किसी तरह की दवा खुद भी देने की सोच रहे हैं तो पहले पशु चिकित्सक से जरूर बात कर लें। 

आशा करते हैं हमारे द्वारा दी गई विब्रियोसीस रोग से जुड़ी जानकारी आपको पसंद आई होगी। अगर आपको यह लेख पसंद आया हो तो आप ऐसी जानकारी हमारी ऐप पर भी पड़ सकते हैं। आपको बता दें कि हमारी एनिमॉल ऐप आपको कई तरह से फायदे दे सकती है जैसे पशु खरीदना, पशु बेचना या पशु से संबंधित चिकित्सीय सलाह लेने के लिए आदि। अगर आप Animall App डाउनलोड करना चाहें तो इस विकल्प पर क्लिक करके कर सकते हैं। 

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