अफारे से बचने के लिए आम क्या-क्या उपाय है?

अफारे से बचने के लिए निम्नलिखित चीजों का ध्यान रखें:-
(क) चारा खिलाने से पहले पानी पिलाना चाहिए|
(ख) दाना खिलने में अचानक बदलाव न करे|
(ग) गला-सड़ा दाना न दें|
(घ) चारा पूरा पका हुआ हो|
(ङ) पशु को हर रोज़ व्यायाम करवाना चाहिए|

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पशु में गर्भपात होने से कैसे बचाये?

1.नए पशु को फार्म में लाने से पहले बीमारी की जांच अवश्य करवाएं एवं उन्हें कम से कम एक माह तक अलग रखें।
2.4 से 6 माह की बछिया को ब्रुसेल्ला अबॉरटस स्ट्रेन 19 का टीका अवश्य लगवाएं।
3.पशु के गर्भपात होने पर उसके भ्रूण, जेर व गर्भनाल को गड्ढा खोद कर उचित तरीके से दबाएं व गर्भपात वाले स्थान को किसी भी कीटाणु नाशक घोल अथवा फिनाइल से साफ़ करें।
4.पशुओं के दूध खून की नियमित जांच करवाएं व पशु चकित्सक की सलाह लें।
6.गाभिन पशु को संतुलित आहार, विटामिन एवं खनिज उचित मात्रा में दें।
7.गर्भपात की स्थिति में पशु को चिन्हित कर पशु चिकित्सक की सलाह से पैथोलॉजी के माध्यम से उचित निदान करा कर उपचार करवाएं।
8.पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान का उपयोग कर गर्भपात की समस्या से बचा जा सकता है।

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पशुओं में गर्भपात के कारण क्या क्या है?

प्रसव के सामान्य काल से पूर्व गर्भ के नष्ट हो जाने को गर्भपात कहा जाता है। गाय तथा भैंसों में कई संक्रामक बीमारियों के कारण गर्भपात हो सकता है। पशुओं में गर्भपात के कारण न केवल नवजात बल्कि दूध का भी नुकसान होता है। इसके कारण किसान भाईयों को आर्थिक संकट होता है, गर्भपात का कोई निश्चित काल नहीं है यह गर्भकाल के किसी भी समय हो सकता है। गौरतलब है कि अक्सर पहली तिमाही में हुए गर्भपात का पता नहीं चल पाता क्योंकि इस समय तक भ्रूण का पूर्ण रूप से विकास नहीं हो पाता। विभिन्न प्रकार के जीवाणु, विषाणु, फफूंद व परजीवी भी पशुओं में भ्रूण की क्षति करते हैं। वैसे तो पशुओं में गर्भपात के अनेक कारण हैं पर कुछ प्रमुख कारणों का विश्लेषण निम्नलिखित है।
1. ब्रुसेल्लोसिस – यह रोग पशुओं में गर्भपात के प्रमुख कारणों में से एक है। यह रोग ब्रुसेल्ला नामक जीवाणु से होता है। ब्रुसेल्ला के संक्रमण के बाद गर्भपात गर्भावस्था की अंतिम तिमाही में होता है उसके बाद पशुओं में जेर रुक जाती है, इसके अतिरिक्त यह जोड़ों में सूजन भी पैदा कर सकता है। यह संक्रमण स्वस्थ पशुओं में पहले से ही संक्रमित पशुओं के गर्भनाल, भ्रूण, योनि स्राव के संपर्क में आने से फैलता है। मुख्यत: यह अनुभव किया गया है कि इस संक्रमण के कारण पशु में एक ही बार गर्भपात होता है व अगली बार ब्यात बिलकुल सामान्य होती है, कई पशुुओं में जेर सही समय पर नहीं निकलती। यह रोग पशुओं से मनुष्यों में भी फ़ैल सकता है तथा बुखार एवं जोड़ों में दर्द का कारण हो सकता है। पशुओं में इस बीमारी का इलाज संभव नहीं है।
2. ट्रायकोमोनियसिस- यह बीमारी ट्रायकोमोनास नमक प्रोटोजोआ के कारण होती है। इस संक्रमण से पशुओं में गर्भावस्था के प्रथम तिमाही में गर्भपात हो जाता है जिसके कारण पशु पालक को गर्भपात का पता नहीं चल पाता। गर्भपात के बाद गर्भाशय में मवाद बन जाती है, पशु बांझपन या अनियमित ऋतु चक्र के लक्षण दिखाता है। यह संक्रमण मादा पशुओं में संक्रमित नर के द्वारा प्रजनन के दौरान होता है। रोग के उपचार हेतु पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए, बचाव हेतु कृत्रिम गर्भाधान की सलाह दी जाती है।
3.विब्रियोसीस – यह बीमारी विब्रियो नामक सूक्ष्म जीव से होती है, यह गर्भपात के साथ-साथ बांझपन व भ्रूणीय क्षय का भी कारण हो सकती है। यह बीमारी कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा गाभिन पशुओं में कम देखने को मिलती है, एंटीबायोटिक्स से इस बीमारी का समाधान किया जा सकता है।
4.कॉर्टिकोस्टेरॉईड्स के उपयोग से – कोर्टीसोन, प्रेडनिसोलोन आदि के उपयोग से गाभिन पशु में गर्भपात हो सकता है।
5.संतुलित आहार एवं विटामिन व खनिज की कमी से।
6.अनेक संक्रमणों के कारण उत्पन्न ज्वर से भी पशुओं में गर्भपात हो सकता है।
7.गाभिन पशु को चोट लगने से।
8.प्रोजेस्ट्रोन हॉर्मोन की कमी से।
9.भ्रूण की नाल घूमने से।
10.गलत समय पर एवं अप्रशिक्षित व्यक्ति से जननांगों की जांच अथवा कृत्रिम गर्भाधान करवाने से।
11.जुड़वाँ बच्चों के कारण।
12.अनेक प्रकार के हरे चारे जैसे ज्वार, इसमें एस्ट्रोजन नामक हार्मोन की मात्रा अधिक होती है, गर्भावस्था के दौरान इस तरह के चारे का अधिक सेवन करने वाले पशुओं में गर्भपात हो सकता है।

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अफारा होने पर पशु का किस तरह बचाव किया जा सकता है?

यदि समय पर अफारे का ईलाज नहीं किया गया तो पशु मर जाता है| निम्नलिखित उपाय सहायक है:-
(क) पशु को खिलाना बंद कर देना चाहिए व पशुचिकित्सक को सम्पर्क करना चाहिए|
(ख) नाल देते समय पशु की जीभ नहीं पकड़नी चाहिए|
(ग) पशु को बैठने नहीं देना चाहिए उसे थोड़ा-थोड़ा चलाना चाहिए|
(घ) जब पशु में अफारे के लक्षण समाप्त हो जाए उसके बाद 2-3 दिनों में धीरे-धीरे पशु को चारा देना चाहिए|

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कृपया पेराटाईफाईड बिमारी के बारे में बताएं जो आमतौर पर नवजात में होती है?

यह बिमारी आम तौर पर 2 सप्ताह से 3 महीने के बीच की आयु वाले नवजात को होती है| यह उन गौशालाओं में ज्यादा होती है जो तंग है व स्वास्थ्यकर नहीं है| मुख्य लक्षणों में तेज़ बुखार, दाना खाने में रुची न होना, मुंह सूखा, सुस्ती, गोबर पीला या मिट्टी के रंग का व दुर्गन्ध| यदि आपको इस बिमारी का आभास हो तो तुरन्त नज़दीक के पशु चिकित्सक को सम्पर्क करें|

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