स्वच्छ दूध का उत्पादन कैसे करें ?

जैसा कि हम सभी जानते है कि दूध एक सर्वोत्तम पेय एवं खाद्य पदार्थ है। इसमें भोजन के सभी आवश्यक तत्व जैसे प्रोटीन, शक्कर, वसा, खनिज लवण तथा विटामिन आदि उचित मात्रा में पाये जाते है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक होते है। इसीलिए दूध को एक सम्पूर्ण आहार कहा गया है।

दूध में पाये जाने वाले उपर्युक्त आवश्यक तत्व मनुष्यों की ही भॉति दूध में पाये जाने वाले सूक्ष्म (आँख से न दिखायी देने वाले) जीवाणुओं की वृद्धि के लिए भी उपयुक्त होते है, जिससे दूध में जीवाणुओं की वृद्धि होते ही दूध शीघ्र खराब होने लगता है। इसे अधिक समय तक साधारण दशा में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है। दूसरे कुछ हानिकारक जीवाणु दूध के माध्यम से दूध पीने वालों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ पैदा कर देते हैं। अतः दूध को अधिक समय तक सुरक्षित रखने, गन्दे एवं असुरक्षित दूध की पीने से होने वाली बीमारियों से उपभोक्ताओं को बचाने तथा अधिक आर्थिक लाभ कमाने के उद्देश्य से दूध का उत्पादन साफ तरीकों से करना अत्यन्त आवश्यक है।

स्वच्छ दूध क्या होती है

वह दूध जो साफ एवं बीमारी रहित जानवरों से, साफ वातावरण में, साफ एवं जीवाणु रहित बर्तन मे, साफ एवं बीमारी रहित ग्वालों द्वार निकाला गया हो तथा जिसमें दिखाई देने वाली गन्दगियों (जैसे गोबर के कण, घास-फूस के तिनके, बाल मच्छर, मक्खियाँ आदि) बिल्कुल न हो तथा न दिखाई देने वाली गन्दगी जैसे सूक्ष्म आकार वाले जीवाणु कम से कम संख्या में हो। दूध में दो प्रकार की गन्दगियाँ पायी जाती है :

आँख से दिखाई देने वाली गन्दगियाँ – जैसे गोबर के कण, घास-फूस के तिनके, बाल धूल के कण, मच्छर, मक्खियाँ आदि। इन्हें साफ कपड़े या छनने से छान कर अलग किया जा सकता है।

ऑख से न दिखाई देने वाली गन्दगियाँ – इसके अन्तर्गत सूक्ष्म आकार वाले जीवाणु आते हैं, जो केवल सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वरा ही देखे जा सकते है। इन्हें नष्ट करने के लिए दूध को गरम करना पड़ता है दूध को लम्बे समय तक रखना हो तो इसे ठंडा करके रखना चाहिये।

 

गन्दगियों के स्रोत

उपरोक्त गन्दगियों के दूध में प्रवेश करने के मुख्यतः दो स्रोत है:

जानवरों के अयन से : थनों के अन्दर से पाये जाने वाले जीवाणु।

बाहरी वातावरण से :

अ) जानवर के बाहरी शरीर से

ब) जानवर के बंधने के स्थान से

स) दूध के बर्तनों से

द) दूध दुहने वाले ग्वाले से

य) अन्य साधनों से मच्छर, मक्खियों, गोबर व धूल के कणों, बालों इत्यादि से।

हमारे देश में इस समय कुल दूध का उत्पादन 3.3 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक हो रहा है जो अधिकतर गाँवों में या शहर की निजी डेरियों में ही उत्पादित किया जाता है, जहां सफाई पर ध्यान न देने के कारण दूध में जीवाणुओं की संख्या बहुत अधिक होती है तथा दिखाई देने वाली गन्दगियाँ जो नहीं होने चाहिए वह भी मौजूद रहती हैं। इसके मुख्य कारण निम्न हैं –

  • गाय के बच्चे को थन से दूध का पिलाना।
  • गाँवों एवं शहरों में गन्दे स्थानों पर दूध निकालना।
  • गन्दे बर्तनों में दूध निकालना एवं रखना।
  • पशुओं को दुहने से पहले ठीक से सफाई न करना।
  • पशुओं को दुहने वाले के हाथ एवं कपड़े साफ न होना।
  • दूध दुहने वाले का बीमार होना।
  • दूध बेचने ले जाते समय पत्तियों, भूसे व कागज आदि से ढकना।
  • देश की जलवायु का गर्म होना।
  • गन्दे पदार्थों से दूध का अपमिश्रण करना।

साफ दूध का उत्पादन स्वास्थ्य एवं आर्थिक लाभ के लिए आवश्यक है अतः ऐसे दूध का उत्पादन करते समय निम्न बातों पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है:

1. दूध देने वाले पशु से सम्बन्धित सावधानियाँ:

  • दूध देने वाला पशु पूर्ण स्वस्थ होना चाहिए। टी.बी., थनैला इत्यादि बीमारियाँ नहीं होनी चाहिए। पशु की जॉच समय-समय पर पशु चिकित्सक से कराते रहना चाहिए।
  • दूध दुहने से पहले पशु के शरीर की अच्छी तरह सफाई कर लेना चाहिए। दुहाई से पहले पशु के शरीर पर खरैरा करके चिपका हुआ गोबर, धूल, कीचड़, घास आदि साफ कर लेना चाहिए। खास तौर से पशु के शरीर के पीछे हिस्से, पेट, अयन, पूंछ व पेट के निचले हिस्से की विशेष सफाई करनी चाहिए।
  • दुहाई से पहले अयन की सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए एवं थनों को किसी जीवाणु नाशक के घोल की भीगे हुए कपड़े से पोंछ लिया जाय तो ज्यादा अच्छा होगा।
  • यदि किसी थन से कोई बीमारी हो तो उससे दूध नहीं निकालना चाहिए।
  • दुहाई से पहले प्रत्येक थन की दो चार दूध की धारें जमीन पर गिरा देनी चाहिए या अलग बर्तन में इक्कठा करना चाहिए।

दूध देने वाले पशु के बांधने के स्थान से सम्बन्धित सावधनियाँ :

  • पशु बॉधने का व खड़े होने के स्थान पर्याप्त होना चाहिए।
  • फर्श यदि सम्भव हो तो पक्का होना चाहिए। यदि पक्का नहीं हो तो कच्चा फर्श समतल हो उसमें गड्डे इत्यादि न हो। मूत्र व पानी निकालने की व्यवस्था होनी चाहिये।
  • दूध दुहने से पहले पशु के चारों ओर सफाई कर देनी चाहिए। गोबर, मूत्र हटा देना चाहिए। यदि बिछावन बिछाया गया हो तो दुहाई से पहले उसे हटा देना चाहिए।
  • दूध निकालने वाली जगह की दीवारें, छत आदि साफ होनी चाहिए। उनकी चूने से पुताई करवा लेनी चाहिए तथा फर्श की फिनाईल से धुलाई दो घण्टे पहले कर लेनी चाहिए।

दूध के बर्तन से सम्बन्धित सावधानियाँ :

  • दूध दुहने का बर्तन साफ होना चाहिए। उसकी सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। दूध के बर्तन को पहले ठण्डे पानी से, फिर सोडा या अन्य जीवाणु नाशक रसायन से मिले गर्म पानी से, फिर सादे खौलते हुए पानी से धोकर धूप में चूल्हे के ऊपर उल्टा रख कर सुखा लेना चाहिए।
  • साफ किए हुए बर्तन पर मच्छर, मक्खियों को नहीं बैठने देना चाहिए तथा कुत्ता, बिल्ली उसे चाट न सके।
  • दूध दुहने के बर्तन का मुंह चौड़ा व सीधा आसमान में खुलने वाला नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे मिट्टी, धूल, गोबर आदि के कण व घास-फूस के तिनके, बाल आदि सीधे दुहाई के समय बर्तन में गिर जायेंगे इसलिए बर्तन सकरे मुंह वाले हो तथा मुंह टेढ़ा होना चाहिए।

दूध दुहने वाले व्यक्ति से सम्बन्धित सावधानियाँ :

  • दूध दुहने वाला व्यक्ति स्वस्थ होना चाहिए तथा उसे किसी प्रकार की कोई बीमारी न हो।
  • उसके हाथों के नाखून कटे होने चाहिए तथा दुहाई से पहले हाथों को अच्छी तरह से साबुन से धो लिया गया हो।
  • ग्वाले या दूध दुहने वाले व्यक्ति के कपड़े साफ होने चाहिए तथा सिर कपड़े से ढका हो।
  • दूध निकालते समय सिर खुजलाना व बात करना, तम्बाकू खाकर थूकना, छींकना, खॉसना आदि गन्दी आदते व्यक्ति में नहीं होनी चाहिए।

अन्य सावधानियाँ :

  • पशुओं को चारा, दाना, दुहाई के समय नहीं देना चाहिए, बल्कि पहले या बाद में दें।
  • दूध में मच्छर, मक्खियों का प्रवेश रोकना चाहिए।
  • ठण्डा करने से दूध में पाये जाने वाले जीवाणुओं की वृद्धि रूक जाती है। दूध को गर्मियों में ठण्डा करने के लिए गाँवों में सबसे सरल तरीका यह कि घर में सबसे ठण्डे स्थान पर जमीन में एक गड्ढा खोद लें और उसमें बालू बिछा दे तथा उसे पानी से तर कर दे और उसके ऊपर दूध का बर्तन जिसका मुँह महीन साफ कपड़े से बँधा हो, उसमें रख दें। समय-समय पर गड्ढे में पानी डालते रहे। ऐसा करने पर आप दूध को अधिक समय तक बिना खराब हुए रख सकते है।
  • दूध को कभी भी बिना गर्म हुए प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।

इस प्रकार से उत्पन्न दूध वास्तव में अमूल्य होता है लेकिन यही दूध अगर अस्वच्छ व असामान्य दशाओं में पैदा किया व रखा गया हो तो वही दूध हानिकारक हो जायेगा।

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दुधारू भैंस की पहचान कैसे करें ?

परिचय

पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय में दुधारू पशुओं के दूध देने की क्षमता का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है। इसलिए गाय/भैंस की खरीदारी करते समय कुछ विशेष जानकारी होना आवश्यक हो जाता है। दुधारू पशु की खरीद में बहुत बड़ी पूंजी खर्च होती है और इनके अच्छे गुणों के ऊपर ही डेयरी व्यवसाय का भविष्य निर्भर करता है। क्योंकि अच्छी नस्ल और गुणवत्ता के दुधारू पशुओं से ही अधिक दुग्ध उत्पादन हासिल कर पाना सम्भव हो पाता है। इसलिए दुधारू पशु का चयन एवं खरीददारी करते समय अच्छी नस्ल, दोष रहित पूर्णत: स्वस्थ्य पशु, लंबे ब्यांत, हर साल बच्चा और अधिक दूध देने वाली गाय/भैंस को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, जिससे व्यवसाय में लगाई गई पूंजी से अधिक से अधिक मुनाफ़ा प्राप्त किया जा सके। अत: पशुपालक निम्न बातों को अम्ल में लाकर अच्छी दुधारू गाय/भैंस का चयन कर सकते हैं।

दुधारू पशुओं की पहचान

तिकोने आकार की गाय अधिक दुधारू होती है। ऐसी गाय की पहचान के लिए उसके सामने खड़े हो जाएँ। इससे गाय का अगला हिस्सा पतला और पिछला हिस्सा चौड़ा दिखाई देगा। शरीर की तुलना में गाय के पैर एवं मुंह-माथे के बाल छोटे होने चाहिए। दुधारू पशु की चमड़ी चिकनी, पतली और चमकदार होनी चाहिए। आँखे चमकली, स्पष्ट और दोष रहित होनी चाहिए। अयन पूर्ण विकसित और बड़ा होना चाहिए। थनों और अयन पर पाई जानी वाली दुग्ध शिराएँ जितनी उभरी और टेड़ी-मेडी होंगी पशु उतना ही अधिक दुधारू होगा। दूध दोहन के उपरांतथन को पूरी तरह से सिकुड़ जाना चाहिए। चारों थनों का आकार एवं आपसी दूरी समान होनी चाहिए। गाय/भैंस के पेट पर पाई जाने वाली दुग्ध शिरा जितनी स्पष्ट, मोटी और उभरी हुई होगी पशु उतना ही अधिक दूध देने वाला होगा। दुधारू पशु को खरीदते समय हमेशा दूसरे अथवा तीसरे ब्यांत की गाय/भैंस को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। क्योंकि इस दौरान दुधारू पशु अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप खुलकर दूध देने लगते हैं और यह क्रम लगभग सातवें ब्यांत तक चलता है। इसके पहले अथवा बाद में दुधारू पशु के दूध देने की क्षमता कम रहती है। दूसरे-तीसरे ब्यांत के पशु को खरीदते समय प्रयास यह होना चाहिए कि गाय/भैंस उस दौरान एक माह की ब्याही हुई हो और उसके नीचे मादा बच्चा हो। ऐसा करने से उक्त पशु के दूध देने की क्षमता का पूरा ज्ञान होने के साथ ही मादा पड़िया अथवा बछडी मिलने से भविष्य के लिए एक गाय/भैंस और प्राप्त हो जाती है, जोकि भविष्य की पूंजी है। दुधारू पशु को खरीदते समय लगातार तीन बार दोहन करके देख लें। क्योंकि व्यापारी चतुराई से काम लेते हैं और आपको पशु खरीदते समय मात्र एक बार सुबह अथवा शाम को ही दोहन करके दिखाएँगे। ऐसा करने से आप को प्रतीत होगा कि यह पशु अधिक दूध देने वाला है, लेकिन सच्चाई यह नहीं होती है। व्यापारी एक समय का दोहन नहीं करता अथवा कम दुग्ध दोहन करता है जिससे दूध की मात्रा अयन में रह जाती है। इस कारण लगता है कि गाय/भैंस अधिक दूध देने वाली है। इसलिए दुधारू पशु की खरीददारी करते समय तीन बार लगातार दुग्ध दोहन अपने सामने अवश्य करा लेना चाहिए।

दुधारू पशु का चयन करते समय उसकी सही आयु का पता लगाना आवश्यक होता है। पशु की सही आयु का पता लगाने के ली उसके दांतों को देखा जाता है। मुंह की निचली पंक्ति में स्थाई दांतों के चार जोड़े होते हैं। ये सभी जोड़े एकसाथ नहीं निकलते हैं। दांत का पहला जोड़ा पौने दो साल की उम्र में, दूसरा जोड़ा ढाई साल की उम्र में, तीसरा जोड़ा तीन साल के अंत में और चौथा जोड़ा चौथे साल के अंत की उम्र में निकलता है। इस प्रकार से दांतों को देखकर नई और पुरानी गाय/भैंस की सटीक पहचान की जा सकती है। औसतन एक गाय/भैंस 20-22 वर्षो तक जीवित रहती है।  गाय/भैंस की उत्पादकता उसकी उम्र के साथ-साथ घटती चली जाती है। दुधारू पशु अपने जीवन के यौवन और मध्यकाल में अच्छा दुग्ध उत्पादन करता है। इसलिए दुधारू पशु का चयन करते समय उसकी उम्र की सही जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।

भैंस के सींग के छल्ले भी आयु का अनुमान लगाने में सहायक होते हैं। प्रथम छल्ला सींग की जड़ पर प्राय: तीन वर्ष की आयु में बनता है। इसके बाद प्रतिवर्ष एक-एक छल्ला और आता रहता है। सींग पर छल्लों की संख्या में दो जोड़कर भैंस की आयु का अनुमान लगाया जा सकता है। परन्तु देखने में आया है कि कुछ लालची लोग अधिक रुपया कमाने के चक्कर में दुधारू पशु खरीददार को धोखा देने के लिए रेती से छल्लों को रगड़ देने हैं। इसलिए यह विधि विश्वसनीय नहीं कही जा सकती है। दूध देने वाले दुधारू गाय/भैंस में सींग पशु की नस्ल की पहचान का मुख्य चिन्ह होते हैं। यद्यपि सींग के होने या नहीं होने का पशु के दुग्ध उत्पादन की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है। भैंस की मुर्रा नस्ल आज भी अपने मुड़े सींगों के कारण ही पहचानी जाती है।

पशु की सेहत से आयु का अनुमान

पशु की सेहत देखकर पशु की आयु का अनुमान लगाया जा सकता है। बूढ़े पशु की अस्थि सन्धियाँ कमजोर हो जाती है और पशु धीमी गति से चलता है। उसकी त्वचा ढीली हो जाती है और मुंह से दांत गिर जाते हैं। बूढ़े पशु की आँख के पीछे तथा कान के बीच के टेम्पोरल क्षेत्रों में गड्ढा बन जाता है। इसके विपरीत युवा अवस्था की भैंसों व गायों का शरीर सुंदर, सुडौल, चुस्त, चमकदार त्वचा तथा चर्बी कम होती है। अच्छी खुराक होने पर भी बूढ़े पशु और स्वस्थ पशु में अंतर कर पाना संभव नहीं हो पाता है। कई बार व्यापारी ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन लगाकर दूध दोहन कराते हैं। इससे बचने के लिए जब भी दुग्ध दोहन कराए तो अपने सामने कम से कम आधा घंटा व्यापारी से बात करने में गुजार दें फिर इसके बाद ही दोहन कराएं।

खुले बाजार, मेलों, हाट पेंठ आदि से पशुओं को खरीदने में कभी-कभी पशु की पहचान करने में धोखा हो जाता है। अत: खरीदते समय उक्त स्थान पर यदि गर्भ इ जांच करने वाला कोई जानकार या पशु चिकित्सक हो तो उससे गर्भ जाँच करा लेना चाहिए। भैंस के सींगों का बारीकी से निरिक्षण करलें कि कहीं दरातींसे घिसे हुए तो नहीं हैं। त्वचा की चमक पर धोखा खाने से पहले देख लेना चाहिए कि भैंस पर चमक पैदा करने के काला तेल तो नहीं चुपड़ दिया गया है। कई बार चालाक किस्म के लोग बकरी, गाय/भैंस के नीचे किसी दूसरी अनुपयोगी गाय/भैंस का नवजात लवारा बाँध देते हैं तथा उसे ताज़ी ब्याही बताकर अधिक कीमत में बेचकर धोखा दे देते है। इससे बचने के लिए बच्चे को उसकी माँ के नीचे लगाकर देखना चाहिए। दूध बढ़ाने के लिए चीनी, गुलकंद, जलेबी की चासनी, ओवर फीडिंग करके भी व्यापारी दूध की मात्रा में वृद्धि करके दिखा देते हैं। अत: इसकी पहचान अनुभवी पशुपालकों के माध्यम से अथवा संभव हो तो तीन-चार दिन नजर रखकर की जा सकती है। भैंस के रंगे खुर तथा काजल लगी आँखों  को सफेद कपड़े से पोछकर पता किया जा सकता है।

दुधारू गाय/भैस की खरीद करते समय अयन और थनों की बारीकी से जांच कर लेनी चाहिए, जिससे थनैला बीमारी के बारे में भली प्रकार से पता चल सके। यदि थन में गाँठ, सूजन आदि के लक्षण हैं तो थनैला हो सकता है। ऐसे पशु को भूलकर भी नही खरीदना चाहिए। फूल देने वाली गाय/भैंस की जांच हेतु उसे ढलान वाले स्थान पर पीछे का हिस्सा करके बिठाकर देखने से पता लगाया जा सकता है। कई बार व्यापारी कमजोर पशु में तथा उसके अयन में हवा भरवा देते हैं, जिससे वह हष्टपुष्ट, गर्भवती अथवा अधिक दूध देने वाली प्रतीत हो सके। ऐसे पशु के पेट, अयन आदि फूले लग रहे अंगों पर दबाव देकर देख लेना चाहिए। हमेशा ऐसे पशुओं को खरीदने का प्रयास करना चाहिए जिनका जन्म, प्रजनन आदि से लेकर उत्पादन आदि का रिकार्ड रखा गया हो। लेकिन ऐसा रिकार्ड केवल सरकारी फार्मों, कामर्शियल डेरी फार्मो एवं प्रजनन संबंधी शोध केन्द्रों पर ही रखा जाता है। अत:अम्ल में लाकर दुधारू पशुओं का चयन करेंगे तो अधिक लाभ कमाने के साथ ही धोखा खाने से बच सकते हैं।

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घरेलू तरीके से भैंस का दूध कैसे बढाये ?

कई लोग अपने गाय और भैंसों से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए टीके आदि का सहारा लेतें हैं, यह पहले कारगर तो साबित होता है लेकिन कई बार इसका प्रभाव विपरीत भी पड़ जाता है.

किसान भाइयों आज हम इस लेख के माध्यम से आपको एक ऐसे रामबाण घरेलू उपाय के बारे में बताएंगे जो गाय और भैंस का दूध बढाने में कारगर साबित होता है. उपाय बहुत सरल है और आपको बहुत ही जल्द इसके नतीजे भी मिलने लगेंगे

दूध में फैट और SNF कैसे बढाएं ?

 

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क्या अजोला से पशुओं में दूध बढ़ा सकते है ?

अजोला में मौजूद पोषक तत्व पशुओं के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। इसमें लगभग 30 प्रतिशत तक प्रोटीन की मात्रा होती है साथ ही लाइसिन, अर्जिनीन और मेथियोनीन से भरपूर है। अजोला में लिग्निन की सूक्ष्म मात्रा से पशुओं में पाचन सरलता से होता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि यूरिया की जगह अजोला का प्रयोग किया जाए तो फिर उत्पादन भी अच्छा होता है। क्योंकि इसमें नाइट्रोजन की मात्रा 30 फीसदी होती है, इसके अतिरिक्त खनिज भी अच्छी मात्रा में मौजूद होते हैं।

दूध उत्पादन में उपयोगी अजोला-

दूध उत्पादन में अजोला काफी उपयोगी है। इससे दूध में वसा की मात्रा बढ़ती है। अजोला के चलते दूध का उत्पादन बीस फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है। संकर नस्लीय गायों में अजोला की सहायता से खर्च भी कम होता है साथ ही दूध का उत्पादन भी 35 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इसे राशन के साथ समान अनुपात में मिलाकर पशु को खिलाया जा सकता है। इस प्रकार महंगे राशन से खर्च कम किया जा सकता है।

शुद्ध प्रजाति का इस्तेमाल-

यदि अजोला की शुद्ध प्रजाति का इस्तेमाल किया जाए तो इससे अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसका अधिक उत्पादन लेने के लिए इसकी कटाई 1 सेमी. पर कर दें। भारत में अजोला की औसत लंबाई 2 से 3 सेमी. तक होती है।

महत्वपूर्ण तथ्य-

यदि अजोला की बात करें तो यह देश में चारा की उपलब्धता कम खर्च में बढ़ाई जा सकती है। इसे अधिक सरलता से बढ़ाया जा सकता है। इसे गाय, भैंस, बकरी आदि के लिए अच्छा चारा के रूप में दिया जा सकता है। इसे तालाब, नदी और गड्ढे में आसानी से उत्पादित किया जा सकता है। अजोला को रबी और खरीफ के मौसम में आसानी से उगा सकते हैं। यह रासायनिक खाद का एक विकल्प के तौर पर है। इसके उपयोग से पशुओं में बांझपन की समस्या में कमी लायी जा सकती है।

कैसे उगाएं अजोला-

नेशनल रिसोर्स डेवलेपमेंट विधि के अनुसार इसे प्लास्टिक शीट के साथ 2 मी.X 2मी. X 0.2मी का क्षेत्र तैयार कर इसमें 15 किग्रा. तक उपजाऊ मिट्टी डालते हैं। फिर इसे 2 किग्रा. गोबर और 30 ग्राम सुपर फास्फेट डालते हैं। इसके बाद में पानी डालकर इसका स्तर 10 सेमी. तक पहुंचा दिया जाता है। अब अजोला की एक किग्रा. की मात्रा को डालते हैं। देखते ही देखते 10 से 15 दिन बाद अजोला की लगभग आधा किलो मात्रा मिलनी शुरु हो जाती है। अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए 20 ग्राम सुपर फास्फेट तथा एक किग्रा. की मात्रा हर पांच साल बाद डालनी चाहिए।

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संकर पशुओं से कितनी बार दूध निकालना चाहिए?

अधिक दूध देने वाले संकर पशुओं से दिन में तीन बार दूध निकालना चाहिये और दूध निकालने के समय में बराबर का अंतर होना चाहिये। अगर पशु कम दूध देता है तो दो बार (सुबह और शाम को) दूध निकालना उचित है, लेकिन इसके बीच भी बराबर समय होना चाहिये। इस से दूध का उत्पादन बढ़ जाता है और निशचिंत समय पर पशु स्वयं दूध निकलवाने के लिए तैयार हो जाता है।

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