पशुओं में परजीवी रोगों के मुख्य लक्षण क्या होते हैं?

पशुओं में पाये जाने वाले आम परजीवी रोगों के मुख्य लक्षण इस प्रकार है:
1. पशुओं का सुस्त दिखायी देना।
2. पशुओं के खाने पीने में कमी आना।
3. पशुओं की तत्व की चमक में कमी आना।
4. पशु में खून की कमी हो जाना।
5. पशुओं की उत्पादन क्षमता में कमी आना।
6. पशुओं का कमजोर होना।
7. पशुओं के प्रजजन में अधिक बिलम्ब होना।

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ब्याने से पहले पशु क्या संकेत देते हैं ?

डेरी किसानों के लिए यह जरुरी है की वह पशुओं के व्यवहार को समझे ताकि वह आसानी से उनकी समस्याओं को जानकर उनका निदान कर पाए | ब्याने की अवस्था को जानना पशुपालकों के लिए बहुत जरुरी है | सभी पशु यदि वह सामान्य अवस्था में नहीं है तो वह संकेतों के माध्यम से बताता है | विभिन्न अवस्थाओं में से ब्याने से पूर्व भी पशु कुछ संकेत देते हैं |मादा पशुओं ब्याने के संकेतों को समझने से पशुपालक को या जानने में मदद मिलती है कि पशु चिकित्सा सहायता की कब आवश्यकता होगी। ब्याने के संकेतों को मूल रूप से 3 अवस्थाओं से गुजरती है

1. ब्याने से पहले के संकेत (ब्याने से 24 घंटे पहले)

2. ब्याना

3.गर्भनाल/जेर का निष्कासन करना

ब्याने से पहले के संकेत (ब्याने से 24 घंटे पहले)

  • ब्याने से पहले पशु क्या संकेत देते हैं मादा पशुओं में ब्याने से पूर्व निम्न लक्षण दिखने लगते हैं | इन संकेतों को जान आप समझ सकते ही आप समझ सकते हैं की पशु जल्द ही ब्याने वाला है |
  • यदि पशु के योनि द्वारा से स्वच्छ श्लेष्मा का रिसाव हो रहा हो और थनों का दूध से भर जाना प्रारंभ हो जाता है इसे ही पशु के ब्याने की शूरूआत के आसन्न लक्षण हैं।
  • समूह से अलग रहने की कोशिश करता है।
  • ऐसे समय में पशु की भूख खत्म हो जाती है और वह खाने में दिलचस्पी नहीं लेता |
  • पशु बेचैन होता है और पेट पर लातें मारता है या अपने पार्श्व/बगलों को किसी चीज से रगड़ने लगता है।
  • श्रोणि स्नायु/पीठ की मांशपेशियां ढीली पड़ जाती है जिस से पूँछ ऊपर उठ जाती है।
  • योनि का आकार बड़ा एवं मांसल हो जाता है।
  • थनों में दूध का भराव ब्याने के 3 सप्ताह पहले से लेकर ब्याने के कुछ दिन बाद तक हो सकता है।
  • बच्चा जैसे-जैसे प्रसव की स्थिति में आता है, वैसे-वैसे पशु के पेट का आकार बदलता है।

ब्याने के दिन का पता लगाना

  • यदि आपको यह पता करना है की पशु (गाय या भैंस ) का ब्याना का सही समय क्या है तो आप इस तरह से निकाल सकते हैं |
  • जब भी पशु का गर्भधान करवाएं हमेशा गर्भाधान की तारीख लिखकर रखें।
  • अगर पशु पुन: मद में नहीं आता है तो गर्भाधान के 3 माह पश्चात् गर्भ की जाँच अवश्य करवाएं।
  • यदि गर्भाधान सही हुआ है तो आप उसके ब्याने का समय निकाल सटे हैं क्योकि गाय का औसत गर्भकाल 280-290 दिन एवं भैंस 305 – 318 दिन।

ब्याने के संकेत (ब्याने के 30 मिनट पहले से लेकर 4 घंटे तक)

  • सामान्य रूप से ब्याते समय बछड़े के आगे के पैर और सिर सबसे पहले दिखाई देते हैं।
  • ब्याने की शुरूआत पानी का थैला दिखाई देने से होती है।
  • यदि बछड़े की स्थिति सामान्य है तो पानी का थैला फटने के 30 मिनट के अंदर पशु बछड़े को जन्म दे देता है।
  • प्रथम बार ब्याने वाली बछड़ियों में यह समय 4 घंटे तक हो सकता है।
  • पशु खड़े खड़े या बैठकर ब्या सकता है।
  • यदि पशु को प्रसव पीड़ा शुरु हुए एक से ज्यादा समय हो जाएँ और पानी का थैला दिखाई न दे तो तुरंत पशु चिकित्सा सहायता बुलानी चाहिए

गर्भनाल/जेर का निष्कासन (ब्याने के 3-8 घंटे बाद)

  • सामान्यतया गर्भनाल/जेर पशु के ब्याने के 3-8 घंटे बाद निष्कासित हो जाती है।
  • अगर ब्याने के 12 घंटे बाद तक भी गर्भनाल न गिरे तो इसे गर्भनाल का रुकाव कहते हैं।
  • कभी भी रुकी हुई गर्भनाल को ताकत लगाकर नहीं खींचे, इससे तीव्र रक्तस्राव हो सकता है और कभी-कभी पशु की मौत भी हो सकती है।

 

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दुधारू पशुओं मे बांझपन का कारण और उपचार क्या है ?

पशुओं में बांझपन – कारण और उपचार

भारत में डेयरी फार्मिंग और डेयरी उद्योग में बड़े नुकसान के लिए पशुओं का बांझपन ज़िम्मेदार है. बांझ पशु को पालना एक आर्थिक बोझ होता है और ज्यादातर देशों में ऐसे जानवरों को बूचड़खानों में भेज दिया जाता है.

पशुओं में, दूध देने के 10-30 प्रतिशत मामले बांझपन और प्रजनन विकारों से प्रभावित हो सकते हैं. अच्छा प्रजनन या बछड़े प्राप्त होने की उच्च दर हासिल करने के लिए नर और मादा दोनों पशुओं को अच्छी तरह से खिलाया-पिलाया जाना चाहिए और रोगों से मुक्त रखा जाना चाहिए.

बांझपन के कारण

बांझपन के कारण कई हैं और वे जटिल हो सकते हैं. बांझपन या गर्भ धारण कर एक बच्चे को जन्म देने में विफलता, मादा में कुपोषण, संक्रमण, जन्मजात दोषों, प्रबंधन त्रुटियों और अंडाणुओं या हार्मोनों के असंतुलन के कारण हो सकती है.

यौन चक्र

गायों और भैंसों दोनों का  यौन (कामोत्तेजना) 18-21 दिन में एक बार 18-24 घंटे के लिए होता है. लेकिन भैंस में, चक्र गुपचुप तरीके से होता है और  किसानों के लिए एक बड़ी समस्या प्रस्तुत करता है. किसानों के अल-सुबह से देर रात तक 4-5 बार जानवरों  की सघन निगरानी करनी चाहिए. उत्तेजना का गलत अनुमान बांझपन के स्तर में वृद्धि कर सकता है. उत्तेजित पशुओं में दृश्य लक्षणों का अनुमान लगाना  काफी कौशलपूर्ण  बात है. जो किसान अच्छा रिकॉर्ड बनाए रखते हैं और जानवरों के हरकतें देखने में अधिक समय बिताते हैं, बेहतर परिणाम प्राप्त करते हैं.

बांझपन से बचने के लिए युक्तियाँ

  • ब्रीडिंग कामोत्तेजना अवधि के दौरान की जानी चाहिए.
  • जो पशु कामोत्तेजना नहीं दिखाते हैं या जिन्हें चक्र नहीं आ रहा हो, उनकी जाँच कर इलाज किया जाना चाहिए.
  • कीड़ों से प्रभावित होने पर छः महीने में एक बार पशुओं का डीवर्मिंग के उनका स्वास्थ्य ठीक रखा जाना चाहिए. सर्वाधिक डीवर्मिंग में एक छोटा सा निवेश, डेरी उत्पाद प्राप्त करने में अधिक लाभ ला सकता है.
  • पशुओं को  ऊर्जा के साथ प्रोटीन, खनिज और विटामिन की आपूर्ति करने वाला एक अच्छी तरह से संतुलित आहार दिया जाना चाहिए. यह  गर्भाधान की दर में  वृद्धि  करता है, स्वस्थ गर्भावस्था, सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करता है, संक्रमण की घटनाओं को कम और एक स्वस्थ बछड़ा होने में मदद करता है.
  • अच्छे पोषण के साथ युवा मादा बछड़ों की देखभाल उन्हें 230-250 किलोग्राम इष्टतम शरीर के वजन के साथ सही समय में यौवन प्राप्त करने में मदद करता है, जो प्रजनन और इस तरह बेहतर गर्भाधान के लिए उपयुक्त होता है.
  • गर्भावस्था के दौरान हरे चारे की पर्याप्त मात्रा  देने से नवजात बछड़ों को अंधेपन से बचाया जा सकता है और (जन्म के बाद)  नाल को बरकरार रखा जा सकता है.
  • बछड़े के जन्मजात दोष और संक्रमण से बचने के लिए सामान्य रूप से सेवा लेते समय सांड के प्रजनन इतिहास की जानकारी  बहुत महत्वपूर्ण है.
  • स्वास्थ्यकर परिस्थितियों में गायों की सेवा करने और बछड़े पैदा करने से गर्भाशय के संक्रमण से बड़े पैमाने पर  बचा जा सकता है.
  • गर्भाधान के 60-90 दिनों के बाद गर्भावस्था की पुष्टि के लिए जानवरों की जाँच योग्य पशु चिकित्सकों द्वारा  कराई जानी चाहिए.
  • जब गर्भाधान होता है, तो गर्भावस्था के दौरान मादा यौन उदासीनता की अवधि में प्रवेश करती है (नियमित कामोत्तेजना का प्रदर्शन नहीं करती). गाय के लिए गर्भावस्था  अवधि लगभग 285 दिनों की होती है और भैंसों के लिए, 300 दिनों की.
  • गर्भावस्था के अंतिम चरण के दौरान अनुचित तनाव और परिवहन से परहेज किया जाना चाहिए.
  • गर्भवती पशु को  बेहतर खिलाई-पिलाई प्रबंधन और प्रसव देखभाल के लिए सामान्य झुंड से दूर रखना चाहिए.
  • गर्भवती जानवरों का प्रसव से दो महीने पहले पूरी तरह से दूध निकाल लेना चाहिए और उन्हें पर्याप्त पोषण और व्यायाम दिया जाना चाहिए. इससे माँ के स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद मिलती है,  औसत वजन के साथ एक स्वस्थ बछड़े का प्रजनन होता है, रोगों में कमी होती है और यौन चक्र की शीघ्र वापसी होती है.
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दुधारू पशु के दूध को सुखाना क्यों जरूरी है?

गर्भवस्था के समय दोनों माँ व पेट में पल रहे बच्चे को अधिक पोषाहार की आवश्यकता होती है इसलिए पशु को व्याने से तीन महीने पहले दूध सुखा देना/छोड़ देना चाहिए इससे पशु की आदर्श दूध उत्पादक क्षमता सुनिश्चित होती है|

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अफारे से बचने के लिए आम क्या-क्या उपाय है?

अफारे से बचने के लिए निम्नलिखित चीजों का ध्यान रखें:-
(क) चारा खिलाने से पहले पानी पिलाना चाहिए|
(ख) दाना खिलने में अचानक बदलाव न करे|
(ग) गला-सड़ा दाना न दें|
(घ) चारा पूरा पका हुआ हो|
(ङ) पशु को हर रोज़ व्यायाम करवाना चाहिए|

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