हम अपने जानवरों को संक्रामक रोगों से कैसे बचा सकते है?

निम्नलिखित उपाए मंदगार है:-
(क) पशुचिकित्सक की सलाह से समय पर टीका करण करवाना|
(ख) बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना|
(ग) गोबर पेशाब ओर जेरा आदि (बिमार पशुओं) को एक गड्डे में जला देना चाहिए व ऊपर से चूना डालना|
(घ) मरे हुए फू को शव को गड्डे में डालकर ऊपर चूना डालकर दबाना चाहिए|
(ङ) गौशाला के प्रवेश द्वारा पर फुट बाद बनाना चाहिए|
(च) पोटाशियम परमेगनेट व फिनाईल से हमेशा गौशाला की सफाई करनी चाहिए|

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दुधारू मवेशी योजना क्या है ?

ग्रामीण क्षेत्र के गरीब रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों के लिए दुधारू मवेशी योजना के तहत लाभ देने का काम किया जाता है। इस योजना के अंतर्गत दुग्ध उत्पादन करने वालों को 50% अनुदान एवं 50% ऋण पर दो दुधारू मवेशी दिए जाते हैं। दुधारू मवेशी गाय अथवा भैंस हो सकते है। प्रत्येक मवेशी 6 माह के अंतराल पर दिया जाता है।
योजना लागत में पशु की खरीद के लिए 70,000 दिए जाते हैं। इसके अलावा मवेशियों को रखने के लिए गौ शाला के निर्माण के लिए 15,000 रुपए दिए जाते हैं। इसके अलावा 3 वर्षों के लिए पशु के लिए बीमा प्रीमियम करवाए कराया जाता है। इसके लिए 8000 का लाभ दिया जाता है।

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पशु खरीदते समय पशु की उम्र कैसे जानें ?

वैसे तो पशु की उम्र का अंदाजा लगाने के लिए काफी चीजो को देखा जाता है। पर अगर हमें पशु की उम्र का बिल्कुल सटीक अंदाज लगाना हैं तो इसके लिए हम पशु के दांत और सींग देखते हैं।

इसमें भी हम ज्यादा महत्व पशु के दांतों को देते हैं। क्योंकि पशु के सींग तो कई बार किसी बाहरी चोट लगने के कारण या किसी अन्य पशु से लड़ाई होने के कारण उसके सींग का बाहरी खोल उतर जाता है। जिस कारण उसकी उम्र का सही आंकलन करना मुश्किल हो जाता हैं।

इस कारण हम पशु के दांतों को ज्यादा महत्व देते हैं उसकी उम्र का आंकलन करते समय। तो आइए जानते हैं के पशुओं के दांतों से उसकी उम्र का पता कैसे लगाएं।

जो लोग दूध का व्यवसाय करते हैं उनके लिए कम उम्र के पशु खरीदना काफी फायदेमंद होता हैं। पशु की उम्र का पता उनके दांतों की संख्या और बनावट से आसानी से लगाया जा सकता हैं। किसी भी पशु के कच्चे और पक्के अथवा स्थाई और अस्थाई दाँत होते हैं। कच्चे अथवा अस्थाई दाँत पशु के जन्म के समय ही जाते हैं। जबकि पक्के अथवा स्थाई दाँत पशु के कच्चे दाँत टूटने पर आते हैं।

सबसे पहले पशु के आगे के दो दाँत टूटते हैं तथा फिर और दाँत टूटते हैं। कच्चे दाँत टूटने के बाद जो पक्के दाँत आते हैं वो काफी लंबे चौड़े और बड़े होते हैं और एक साथ दो दाँत आते हैं।

इन्ही पक्के दाँतो से हम पशु की उम्र का पता लगा सकते हैं।

                   पक्के दाँत की संख्या                             गाय की उम्र                      भैंस की उम्र

दो दाँत                                             2 से 2.5 वर्ष                       2.5 से 3 वर्ष

चार दाँत                                             3 वर्ष                                  3.5 वर्ष

छः दाँत                                                4 वर्ष                                   4.5 वर्ष

आठ दाँत                                             4.5 वर्ष                               5 से 5.5 वर्ष

इस प्रकार से हम गाय और भैंस की उम्र का पता आसानी से लगा सकते हैं तथा अपने लिए सही उम्र की भैंस खरीद सकते हैं। लगभग 4-5 वर्ष की उम्र की भैंस लेना काफी फायदेमंद होता हैं जिससे कि हमे अगले कई सालों तक दूध के लिए और पशु खरीदने की जरूरत ना पड़े।

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साईलेस बनाने की प्रक्रिया बतायें।

हरे चारे जैसे मक्की, जवी, चरी इत्यादि का एक इंच से दो इंच का कुतरा कर लें। ऐसे चारों में पानी का अंश 65 से 70 प्रतिशत होना चाहिए। 50 वर्ग फुट का एक गड्डा मिट्टी को खोद कर या जमीन के ऊपर बना लें जिसकी क्षमता 500 से 600 किलो ग्राम कुत्तरा घास साईलेस की चाहिए। गड्डे के नीचे फर्श वह दीवारों की अच्छी तरह मिट्टी व गोबर से लिपाई पुताई कर लें तथा सूखी घास या परिल की एक इंच मोती परत लगा दें ताकि मिट्टी साईलेस से न् लगे। फिर इसे 50 वर्ग फुट के गड्डे में 500 से 600 किलो ग्राम हरे चारे का कुतरा 25 किलो ग्राम शीरा व 1.5 किलो यूरिया मिश्रण परतों में लगातार दबाकर भर दें ताकि हवा रहित हो जाये घास की तह को गड्डे से लगभग 1 से 1.5 फुट ऊपर अर्ध चन्द्र के समान बना लें। ऊपर से ताकि गड्डे के अंदर पानी व वा ना जा सके। इस मिश्रण को 45 से 50 दिन तक गड्डे के अंदर रहने दें। इस प्रकार से साईलेस तैयार हो जाता है जिसे हम पशु की आवश्यकता अनुसार गड्डे से निकलकर दे सकते हैं।

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थनैला रोग केजीवाणु कारक कौन से है?

थनों की सूजन को थनैला रोग कहते है और यह मुख्यतः वर्षा ऋतु की समस्या है। इसके प्रमुख जीवाणु कारक निम्न है:- स्टैफाइलोकोकस, स्ट्रैप्टोकोकस , माइकोप्लाज़मा, कोराइनीबैक्टिरीयम, इ.कोलाई (E.Col) तथा कुछ फंफूद होते हैं।

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