पशुओं में दूध की मात्रा को कैसे बढाएं ?

कई लोग अपने गाय और भैंसों से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए टीके आदि का सहारा लेतें हैं, यह पहले कारगर तो साबित होता है लेकिन कई बार इसका प्रभाव विपरीत भी पड़ जाता है.
किसान भाइयों आज हम इस लेख के माध्यम से आपको एक ऐसे रामबाण घरेलू उपाय के बारे में बताएंगे जो गाय और भैंस का दूध बढाने में कारगर साबित होता है. उपाय बहुत सरल है और आपको बहुत ही जल्द इसके नतीजे भी मिलने लगेंगे.
सामग्री :- इसको बनाने के लिए निम्न चीजों की आवश्यकता पड़ती है…
250 ग्राम गेहू दलिया,
100 ग्राम गुड सर्बत (आवटी),
50ग्राम मैथी,
1 कच्चा नारियल,
25-25 ग्राम जीरा व अजवाईन आदि.
उपयोग:-
1- सबसे पहले दलिये, मैथी व गुड़ को पका ले, बाद मे उसमे नारियल को पीसकर डाल दे. ठण्डा होने पर खिलाये.
2- ये सामग्री 2 महीने तक केवल सुबह खाली पेट ही खिलाये.
3- इसे गाय को बच्चा देने से एक महीने पहले शूरू करना और बच्चा देने के एक महीने बाद तक देना.
4- 25-25 ग्राम अजवाईन व जीरा गाय के ब्याने के बाद केवल 3 दिन ही देना. बहुत अच्छा परिणाम ले सकते हैं.
5- ब्याने के 21 दिन तक गाय को सामान्य खाना ही दे.
6- गाय का बच्चा जब 3 महीने का हो जाय या जब गाय का दूध कम हो जाये तो उसे 30 gm/दिन जवस औषधि खिलाये दूध कम नही होगा।
रोग – दूधारू गाय व भैंस का दूध बढ़ाने के उपाय ।
औषधि – 200 से ३०० ग्राम सरसों का तेल , 250 ग्राम गेहूँ का आटा लेकर दोनों को आपस में मिलाकर सायं के समय पशु को चारा व पानी खाने के बाद खिलायें इसके बाद पानी नहीं देना है ओर यह दवाई भी पानी के साथ नहीं देनी है। अन्यथा पशु को खाँसी हो सकती है । पशु को हरा चारा व बिनौला आदि जो खुराक देते है वह देते रहना चाहिए । 7-8 दिनों तक खिलाए फिर दवा बन्द कर देनी चाहिए।

दूध में फैट और SNF कैसे बढाएं ?

 

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दुधारू पशु के दूध को सुखाना क्यों जरूरी है?

गर्भवस्था के समय दोनों माँ व पेट में पल रहे बच्चे को अधिक पोषाहार की आवश्यकता होती है इसलिए पशु को व्याने से तीन महीने पहले दूध सुखा देना/छोड़ देना चाहिए इससे पशु की आदर्श दूध उत्पादक क्षमता सुनिश्चित होती है|

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राजस्थान पशु बीमा योजना कितना लाभदायक है?

दोस्तों आप सभी जानते हैं हम आपको अपनी ऐप पर हर सरकारी योजना की जानकारी देने की कोशिश करते हैं| दोस्तों आज हम आपके लिए एक और राजस्थान की सरकारी योजना लेकर आए हैं जिस योजना का नाम है – भामाशाह पशु बीमा योजना| दोस्तों यह योजना पशुओं के लिए शुरू की गई है कि अब राजस्थान के लोगों के पास जो भी पशु है उनका बीमा कराया जाएगा ताकि किसान ज्यादा से ज्यादा पशु रखकर अपनी आय को बढ़ा सकें |

इसलिए सरकार ने भामाशाह पशु बीमा योजना का आरंभ किया है | राजस्थान में रहने वाले लोग घर बैठे अपने पशुओं का बीमा करा सकेंगे |

योजना के लाभ

  • महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जाएगा ।
  • सभी श्रेणियों के लिए वित्तीय समावेशन ।
  • लाभार्थी के बैंक खाते में नकद का सीधा हस्तांतरण ।
  • घर के पास बैंकिंग सेवाएं ।
  • पूरी पारदर्शिता के साथ और बिना किसी देरी के घर पर नकद और गैर- नकद लाभ ।
  • परिवार के सदस्यों की सही पहचान की स्थापना ।
  • सामाजिक सुरक्षा पेंशन, छात्रवृति योजना,  NREGA भुगतान के रूप में योजनाओं का लाभ ।
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गाय-भैंस के थनैला रोग का घरेलू उपचार कैसे करें ?

थनेला रोग या स्तनशोथ (Mastitis) दुधारू पशुओं को लगने वाला एक रोग है। थनैला रोग से प्रभावित पशुओं को रोग के प्रारंभ में थन गर्म हो जाता हैं तथा उसमें दर्द एवं सूजन हो जाती है। शारीरिक तापमान भी बढ़ जाता हैं। लक्षण प्रकट होते ही दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूध में छटका, खून एवं पीभ (पस) की अधिकता हो जाती हैं। पशु खाना-पीना छोड़ देता है एवं अरूचि से ग्रसित हो जाता हैं।

लक्षण

अलाक्षणिक या उपलाक्षणिक प्रकार के रोग में थन व दूध बिल्कुल सामान्य प्रतीत होते हैं लेकिन प्रयोगशाला में दूध की जाँच द्वारा रोग का निदान किया जा सकता है। लाक्षणिक रोग में जहाँ कुछ पशुओं में केवल दूध में मवाद/छिछड़े या खून आदि आता है तथा थन लगभग सामान्य प्रतीत होता है वहीं कुछ पशुओं में थन में सूजन या कडापन/गर्मी के साथ-साथ दूध असामान्य पाया जाता है। कुछ असामान्य प्रकार के रोग में थन सड़ कर गिर जाता है। ज़्यादातर पशुओं में बुखार आदि नहीं होता। रोग का उपचार समय पर न कराने से थन की सामान्य सूजन बढ़ कर अपरिवर्तनीय हो जाती है और थन लकडी की तरह कडा हो जाता है। इस अवस्था के बाद थन से दूध आना स्थाई रूप से बंद हो जाता है। सामान्यतः प्रारम्भ में मेंएक या दो थन प्रभावित होते हैं जो कि बाद में अन्य थनों में भी रोग फैल सकता है। कुछ पशुओं में दूध का स्वाद बदल कर नमकीन हो जाता है।

इस अदृश्य प्रकार की बीमारी को समय रहते पहचानने के लिए निम्न प्रकार के उपाय किए जा सकते हैं।

  • 1. पी.एच. पेपर द्वारा दूध का समय-समय पर जांच या संदेह की स्थिति में विस्तृत जांच।
  • 2. कैलिफोर्निया मॉस्टाईटिस सोल्यूशन के माध्यम से जांच।
  • 3. संदेह की स्थिति में दूध कल्चर एवं सेन्सीटिभीटी जांच।

इसके अलावे पशुओं का उचित रख रखाव, थन की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाली औषधियों का प्रयोग एवं रोग का ससमय उचित ईलाज करना श्रेयस्कर हैं।

उपचार

रोग का सफल उपचार प्रारम्भिक अवस्थाओं में ही संभव है अन्यथा रोग के बढ़ जाने पर थन बचा पाना कठिन हो जाता है। इससे बचने के लिए दुधारु पशु के दूध की जाँच समय पर करवा कर जीवाणुनाशक औषधियों द्वारा उपचार पशु चिकित्सक द्वारा करवाना चाहिए। प्रायः यह औषधियां थन में ट्‌यूब चढा कर तथा साथ ही मांसपेशी में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है।

थन में ट्‌यूब चढा कर उपचार के दौरान पशु का दूध पीने योग्य नहीं होता। अतः अंतिम ट्‌यूब चढने के 48 घंटे बाद तक का दूध प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। यह अत्यन्त आवश्यक है कि उपचार पूर्णरूपेण किया जाये, बीच में न छोडें। इसके अतिरिक्त यह आशा नहीं रखनी चाहिए कि (कम से कम) वर्तमान ब्यांत में पशु उपचार के बाद पुनः सामान्य पूरा दूध देने लग जाएगा।

थनैला बीमारी की रोकथाम प्रभावी ढ़ंग से करने के लिए निम्नलिखित विन्दुओं पर ध्यान देना आवश्यक हैं।

  • 1. दूधारू पशुओं के रहने के स्थान की नियमित सफाई जरूरी हैं। फिनाईल के घोल तथा अमोनिया कम्पाउन्ड का छिड़काव करना चाहिए।
  • 2. दूध दुहने के पश्चात् थन की यथोचित सफाई लिए लाल पोटाश या सेवलोन का प्रयोग किया जा सकता है।
  • 3. दूधारू पशुओं में दूध बन्द होने की स्थिति में ड्राई थेरेपी द्वारा उचित ईलाज करायी जानी चाहिए।
  • 4. थनैला होने पर तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह से उचित ईलाज करायी जाय।
  • 5. दूध की दुहाई निश्चित अंतराल पर की जाय। थनैला बीमारी से अर्थिक क्षति का मूल्याकंन करने के क्रम में एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है जिसमें यह देखा गया हैं कि प्रत्यक्ष रूप मे यह बीमारी जितना नुकसान करती हैं, उससे कहीं ज्यादा अप्रत्यक्ष रूप में पशुपालकों को आर्थिक नुकसान पहुँचाता हैं। कभी-कभी थनैला रोग के लक्षण प्रकट नहीं होते हैं परन्तु दूध की कमी, दूध की गुणवत्ता में ह्रास एवं बिसुखने के पश्चात (ड्राई काउ) थन का आंशिक या पूर्णरूपेण क्षति हो जाता है, जो अगले बियान के प्रारंभ में प्रकट होती है।

रोग से बचाव/रोकथाम

1. पशुओं के बांधे जाने वाले स्थान/बैठने के स्थान व दूध दुहने के स्थान की सफाई का विशेष ध्यान रखें।

2. दूध दुहने की तकनीक सही होनी चाहिए जिससे थन को किसी प्रकार की चोट न पहुंचे।

3. थन में किसी प्रकार की चोट (मामूली खरोंच भी) का समुचित उपचार तुरंत करायें।

4. थन का उपचार दुहने से पहले व बाद में दवा के घोल में (पोटेशियम परमैगनेट 1:1000 या क्लोरहेक्सिडीन 0.5 प्रतिशत) डुबो कर करें।

5. दूध की धार कभी भी फर्श पर न मारें।

6. समय-समय पर दूध की जाँच (काले बर्तन पर धार देकर) या प्रयोगशाला में करवाते रहें।

7. शुष्क पशु उपचार भी ब्यांने के बाद थनैला रोग होने की संभावना लगभग समाप्त कर देता है। इसके लिए पशु चिकित्सक से संपर्क करें।

8. रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखें तथा उन्हें दुहने वाले भी अलग हों। अगर ऐसा संभव न हो तो रोगी पशु सबसे अंत में दुहें।

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पेशाब में खून आना (हिमोग्लोबिनयुरीया/हीमेचुरिया) बिमारी कैसे होती है?

यह बिमारी आमतौर पर व्याने के 2-4 सप्ताह के बाद या यहां तक की गर्भावस्था के अंतिम दिनों में होती है| यह बिमारी ज्यादा तर भैंसों में होती है| इस बिमरी को स्थानीय भाषा में लाहू मोटाना कहा जाता है| यह बिमारी शरीर में फास्फोरस की कमी की वजह से होती है| मिट्टी में इस लवण की कमी से चारे में फास्फोरस की कमी होती है व पशु के शरीर से कमी चले जाती है| ज्यादा तर जिन पशुओं को सूखा घास/चारा खिलाया जाता है| उनमें फास्फोरस की कमी की संभावना ज्यादा रहती है|

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